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संजय
द्विवेदी के लेखन को सावधानी से देखें तो हम
उनके निरंतर विकसित होते हुए चिन्तन और सरोकारों की व्यापकता
का अन्दाजा लगा सकते हैं।
उनके लेखन
में लेखक की स्वाधीनता अपेक्षाकृत परिपक्व एवं मुक्तिकामी है। प्रतिबद्धता और
स्वायत्ता का फर्क इसी रुप में दिखाई दे जाता है।
उनकी
पुस्तकों की थीम मात्र सुवाच्य और प्रस्तुति भर नहीं, इनमें एक तरह की बहसतलबी और वर्जित-क्षेत्रों में प्रवेश की उत्तेजक सनक भी है ।
तृष्टिगुण के हिसाब से संतुलन बनाए रखने के चक्कर में व्यक्ति जहां का तहां रह जाता
है, अलबत्ता उसका मिश्रधन भारी हो जाता है, किन्तु एक सच्ची कलम एक से पौन का ही
व्यापार करती है जबकि उसका स्वाधीन हस्तक्षेप उसकी प्रगामी यात्रा का हार्न देता
रहता है । जहां संजय
अधिक मुखर, धारदार और जिम्मेदार हैं ।
संजय के लेखन में भारतीय साहित्य, संस्कृति और इसका प्रगतिशील इतिहास बार-बार झलक मारता है बल्कि
इन्हीं की कच्ची मिट्टी से लेखों के ये शिल्प तैयार हुए हैं । अतः
उनका लेखन तात्कालिक सतही टिप्पणियां न होकर,
दीर्घजीवी और एक निर्भीक, संवेदनशील तथा जिन्दादिल पत्रकार के गवाह हैं । ऐसे ही
शल्य और हस्तक्षेप किसी भी समाज
की संजीवनी हैं ।
-अष्टभुजा
शुक्ल
तुलसी उच्च संस्कृत महाविद्यालय, चित्राखोर
बरहुआ,
बनकटी, बस्ती- 272123(उ. प्र. )
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