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 मेरे सीनियर, बड़े भाई

 

- आनंद सिंह

 

संजय जी, मेरे सीनियर, बड़े भाई, एक सफल पत्रकार। 34 साल की उम्र में वो सब कुछ हासिल कर लेने वाले युवा, जिसके लिए लोग दशक गुजार देते हैं। संपादक बन गए पर अपने भीतर के उप संपादक को आज तक मरने नहीं दिया। देर रात आप अगर उन्हें किसी जूनियर रिपोर्टर की कापी एडिट करते देखें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। संपादक होकर भी कापी एडिट करना संजय जी की पुरानी आदत है। स्वदेश में भी ऐसा ही करते रहे, भास्कर और अब हरिभूमि में भी।

 संजयजी से मेरा परिचय 1996 से है, तब वे स्वदेश, भोपाल में कार्यरत थे। मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। मुङो मेरे लोकमत, नागपुर के संपादक श्री एस.एन. विनोद ने सात साल काम करवाने के बाद कहा कि माखनलाल चले जाओ और पत्रकारिता का कोर्स करके आओ। उन्होंने मेरा एडमिशन करवा दिया और मैं माडर्न जर्नलिज्म सीखने की गरज से भोपाल आ गया। यहां संजयजी से स्वदेश के दफ्तर में मुलाकात हुई। इन दिनों स्टार न्यूज, दिल्ली में कार्यरत रघुवीर रिछारिया मेरे सहपाठी थे। उन्होंने ही मेरी मुलाकात संजयजी से करवाई। उन दिनों पत्रकार लाखों नहीं कमा पाते थे। अखबारों में बहुत कम पैसे मिलते थे और मेहनत बहुत ज्यादा होती थी। उस कड़की के दौर में भी संजयजी मुङो चाय पिलाना नहीं भूलते थे। एक दिन उन्होंने कहा-'कुछ लिखोगे?

मैंने पूछा-'पैसे मिलेंगे?

हंस दिए संजयजी, बोले-'स्वदेश अब लेखकों को पैसा देने की स्थिति में नहीं है। हां, तुम्हारा नाम छापने की जिम्मेदारी ले सकता हूं।

पता नहीं उनकी साफगोई थी, या मेरा मन, मैं तैयार हो गया।

उन्होंने कहा-'मीडिया के क्षेत्र में इस साल कई परिवर्तन हुए हैं। एक साल का परिदृश्य बनाकर दो।

मैंने कहा-'...पर मेरे पास संदर्भ तो हैं नहीं। आप तत्काल पूरे वर्ष का विवरण चाहते हैं, कैसे संभव होगा?

उन्होंने मोटे तौर पर बता दिया कि क्या-क्या हुआ है और क्या-क्या लिखना है? मैं दंग रह गया। इस बंदे को सब कैसे जबानी याद है? अखबार का काम, ढेर सी जिम्मेदारियां और इस सबके बीच इतनी शार्प मेमोरी? संजयजी उस दिन से मैंने आपको खुद से बड़ा मान लिया।

 मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने संजयजी के साथ दस महीने हरिभूमि, रायपुर में गुजारे। मैं मानता हूं कि हरिभूमि ने मुङो उबार लिया। संजयजी ने हर उस शख्स को उठाने का प्रयास किया, जो अपनी गलतियों से गिरा हो। संजयजी अपनी आलोचनाओं पर भी सिर्फ मुस्कराते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। बातें बहुत सारी हैं पर मूल बात यही है कि वे बहुत प्यारे इंसान हैं। (मार्च28, 2008)

(लेखक हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में कार्यरत हैं। )

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