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अच्छे
गुरू,
प्यारे
दोस्त और मस्ती के पार्टनर

-अभिषेक
गर्ग
मैं
संजय द्विवेदी का पुराना दोस्त और प्रशंसक हूं। इन दिनों चीन
में एक कंपनी में कार्यरत हूं। संजय द्विवेदी डाट काम वेबसाइट
को देखकर मेरे मन में भी तीव्र इच्छा हुई कि इस वेबसाइट के
कालम कहते हैं लोग में अपने विचार व्यक्त करूं। मैं संजय भैया
से जुड़ा हूं और जैसा कि सारे लेखों में स्पष्ट है कि ज्यादतर
लोग उन्हें अपने सबसे करीबी होने का गुमान रखते हैं,
ऐसी ही मेरी भी इच्छा है कि मैं भी इसका
प्रदर्शन करूं। फिर यह डर भी मन में कहीं है कि पत्रकारिता
क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच मेरी यादें कुछ अजीब सी लगेंगी।
फिर सोचा कि भावनाओं की अभिव्यक्ति लेखनशैली की मोहताज नहीं
है। चाहे वह परदेस में बैठकर देशभक्ति के फिल्मी सीन पर आंखों
से ढुलके आंसू हों या संजय भैया के बारे में किसी की यादों को
पढ़कर फिसले हुए अश्क हों। प्रेम तो प्रेम है,
यही निश्चय करके
की-बोर्ड पर उंगलियां चला रहा हूं।
संजय भैया से पहली मुलाकात अपने भोपाल में महाराणा प्रताप नगर
स्थित किराये के फ्लैट पर हुई। उनसे फोन पर बात करने का
करिश्मा इतना था कि उनके फोन की घंटी बजते ही हम जलती हुई
सिगरेट बुझाकर कमरे में भरा धुआं और बदबू मिटाने की फिक्र में
लग जाते थे।(शायद संजय भैया आज भी इस बात से नावाकिफ हों)इसी
तरह एक दिन वे हमारे फ्लैट पर आए और बेल बजाई। धुआं भगाने और
सिगरेट बुझाने के चक्कर में दरवाजा खोलने में थोड़ी देर हो गई।
संजय भैया बोले-'क्या
कर रहे थे? इतना अधिकार,
इतनी आत्मीयता थी उस संबोधन में कि वे संजय
भैया से तुरंत दादू (बड़े भाई) हो गए। वे उन दिनों 'स्वदेश
समाचार पत्र में काम करते थे। हमारा फ्लैट प्रेस काम्पेक्स से
नजदीक था, सो वे हमारे साथ ही शिफ्ट हो
गए। रोज रात एक बजे, दो बजे घर लौटकर
आते और फिर अलसुबह तक उनसे बहुत सारी चीजें जानने को मिलतीं।
इस सबके बीच यह पता ही नहीं चला कि वे हमारी जिंदगी में कितनी
बड़ी जगह बना चुके हैं। अपने सपनों और अपनी दिनचर्या को हमें
बताए बिना उन्हें नींद नहीं आती थी। फिर यहीं से एक मित्र और
संजय भैया जैसे बड़े भाई का फर्क समङा में आया। किसी भी प्रसंग
पर हमारी बात काटे बिना वे हमें नैतिक और सही दिशा दिखाते थे।
वो रास्ता इतना साफ होता कि और कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं
होती थी। संबंधों के महत्व और उन्हें निभाने की जो कला
उन्होंने बिना क्लासरूम के और बिना गुरू दक्षिणा लिए सिखाई वो
आज भी मेरे व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जो
नेतृत्व क्षमता और शैली संजय भैया में देखी उसी का अनुसरण करके
कार्पोरेट दुनिया में मैं अपनी जगह बनाने में सफल हुआ हूं।
यहां तक कि आज भी वही शैली जारी है। संजय भैया का वो बीच-बीच
में जुमला और फिर वो कहकहे और इन कहकहों के बीच सही मैसेज देने
की कला की नकल करके ग्लोबल नेगोशिएशंस में मैंने इस्तेमाल किया
है। यहां तक कि अब तो विदेशी भी इस कला के मुरीद हैं। जबकि सच
यह है कि शायद मैं संजय भैया की क्षमताओं के पांच प्रतिशत भी
करीब नहीं हूं। संजय भैया की ये नैसर्गिक अदा कार्पोरेट लेसंस
के रूप में रही है। ये तो रही भैया के व्यक्तित्व की बात,
अब मैं एक
इंसान के नाते उनके बारे में कुछ कहना चाहता हूं।
कितना प्यार भरा है इस आदमी में कि हर व्यक्ति के लिए न जाने
कहां से वे इतनी सारी ऊर्जा और आत्मीयता ले आते हैं। किसी के
लिएर् ईष्या भाव नहीं,
किसी से कोई शिकायत नहीं,
क्रोध नहीं। नाराज होंगे तो भी हंसेंगे,
खुश हैं तो भी। मुंबई में मैं और मेरे दोस्तों
के लिए रात तीन बजे सोकर वे ही ऐसे हैं,
जो सुबह छ: बजे जागकर नाश्ता बनाते हुए दिख
सकते हैं। बिना बोले संजय भैया इसी तरह प्रेम के लिए क्या-क्या
पाठ पढ़ाते नजर आते हैं। शायद यही उनसे जुड़े रिश्तों की सफलता
की वजह है। इतनी विशेषताओं के बाद भी वे हर छोटे-बड़े से इतने
सहज हैं कि उनकी ऊंचाई दिखती ही नहीं। तो इस बेहद प्यारे दोस्त,
सर्वश्रेष्ठ गुरू,
लेखन के बारे में कमजोर समङा के बावजूद शायद प्रिय लेखक और
मस्ती के पार्टनर को कौन रोज याद नहीं करना चाहेगा। फिर
भौगोलिक दूरियां भले हजारों मील की हों,
आपका प्यार और
दोस्ती हमारे लिए जीवन की एक उपलब्धि है।
(मई 5, 2008)
लेखक निकाई ग्रुप आफ
कंपनीज,
चाइना में चीफ रिप्रेजेंटेटिव हैं।
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