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 सिखाया उन्होंने पत्रकारिता का व्यवहारवाद

- दीपा

रिश्तों की डोर इंसान को कहां से कहां ले जाती है यह बात मैंने दो साल रायपुर प्रवास के दौरान समझा। और अब वहां से दूर होकर भी पल-पल महसूस करती हूं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय...सिर्फ एक बहाना था..... एक जरिया.... कुछ कभी न ख़त्म होने वाले रिश्ते बनाने का। नई और अनजान जगह, नई युनिवर्सिटी, नए लोग, नए वातावरण के बीच सामंजस्य बना ही रही थी कि अचानक एक दिन एक और नया शख्स हमारे साथ शामिल होने आया।

 

कुलपति महोदय ने एक औपचारिक सभा आयोजित कर उनका परिचय दिया और कहा कि अनेक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों को शोभित कर चुके वे नए शख्स अब हमारे गुरू हैं। पत्रकारिता विभाग के प्रमुख के रूप में एक पत्रकार के आगमन ने मेरे मन में सहज ही एक नया जोश भर दिया था मगर साथ ही एक आशंका भी पैदा हुई। आशंका यह कि जिस स्थान पर जाने के लिए मैं यह पढ़ाई कर रही हूं, जीवन के महत्वपूर्ण दो साल कुर्बान कर रही हूं, वहां से कोई व्यक्ति क्यों वापस आकर शिक्षण से जुड़ना चाहता है? क्या पत्रकारिता में वो दम नहीं रहा या इन्होंने मुश्किलों से बचने के लिए आसान रास्ता इख्तियार किया है....

 

मेरे मन में एक साथ कई प्रश्न उठ रहे थे और दूसरी तरफ उस नए व्यक्ति से सभी विद्यार्थियों का औपचारिक परिचय करवाया जा रहा था। उन्होंने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी और अपना परिचय कुछ इस तरह दिया।  'मेरा नाम संजय द्विवेदी है। मैं कल तक हरिभूमि का समाचार संपादक था और आज से आपकी युनिवर्सिटी का एक सदस्य हूं।' इसके बाद उन्होंने क्या बोला मुझे कुछ याद नहीं क्योंकि मैं अपनी आशंकाओं में ही घिरी रही। हमसब ने एक-एक कर उन्हें अपना परिचय दिया और धीरे-धीरे माहौल अनौपचारिक-सा होने लगा। उनकी बातें, उनके बोलने का अंदाज, उनके हावभाव ने सभी को पहली ही मुलाकात में उनका कायल बना दिया था और विद्यार्थियों ने पत्रकारिता से जुड़े कई सवाल एक साथ कर डाले। विद्यार्थी जिस उत्सुकता से प्रश्न करते वे उतनी ही सहजता से उसका उत्तर देते रहे। उनकी बातें बहुत संतुलित और व्यावहारिक थीं। उनका एक-एक कथन इस बात की गवाही दे रहा था कि यह इंसान चाहे जैसा भी हो, यह पत्रकारिता की नब्ज भली भांति पहचानता है और बहुत सफल पत्रकार है। उनकी अनुभव भरी बातें सुनकर यह मान पाना मुश्किल लग रहा था कि एक सफल पत्रकार आखिर सक्रिय पत्रकारिता से अध्यापन की ओर क्यों रूख कर रहा है? कहीं इनकी उपलब्ध्यिां भ्रम तो नहीं हैं। इसी उधेड़बुन में मैंने उनसे सीधा प्रश्न कर दिया - 'सर आपने अखबार छोड़कर पढ़ाने का निर्णय क्यों ले लिया?'' इसके उत्तर में उन्होंने जो कुछ भी कहा उससे मुझे यही महसूस हुआ कि पत्रकारिता को उन्होंने अपनी साधना बना लिया था । और इस साधना में वे इस कदर रम गए थे कि अपने स्वास्थ्य को भी दरकिनार कर रखा था। अपने पेशे के प्रति इस नि:स्वार्थ समर्पण ने उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालना शुरू कर दिया था जिससे बचने के लिए उन्होंने शिक्षण की ओर रूख किया। उनका मानना था कि ऐसा करके वे पठन-पाठन से तो जुडे रहेंगे ही, पत्रकारिता की बारीकियों से आने वाले वृतिज्ञों को भी रूबरू करा सकेंगे।

 

यह कारण उनपर भरोसा करने के लिए काफी था और उसी पल से मैंने उन्हें अपना गुरू मान लिया था। उनकी दो तीन कक्षाओं के बाद ही मैं उनके व्यक्तित्व की ओर आकर्षित होने लगी थी। उनके पढ़ाने की विधि बड़ी ही निराली थी। न कोई पुस्तक न कोई नोट्स....सिर्फ अपने व्यावहारिक अनुभवों से पत्रकारिता के ऐसे गुर सिखाए जो हजारों टेस्ट बुक्स पढ़ने के बाद भी हासिल कर पाना मुश्किल था। यह सच्चाई मैंने उन्हीं से जाना कि पत्रकारिता सिर्फ परीक्षा में उत्तीर्ण करना या डिग्री हासिल करने का नाम नहीं है बल्कि व्यावहारिक जीवन में आप कितने सहज हो पाते हैं.....इसकी दक्षता हासिल करने का नाम है। वाक्पटुता, मृदुभाषिता और जनसंपर्क.....यही तीन गुण हैं जो आपको सफल पत्रकार बना सकते हैं। हालांकि अपने पूरे स्नातकोत्तर पाठयक्रम के दौरान मैंने अपनी पढ़ाई को बहुत गम्भीरता से लिया और अपने पाठयक्रम में प्रथम स्थान पर भी रही मगर उनकी गुरूवाणी को कभी भूल नहीं सकी।

 

कक्षा के दौरान उनकी बातें सभी ओर से ध्यान हटाकर सिर्फ उनपर केन्द्रित होने को मजबूर कर देती थी। उनका पढ़ाया हुआ कुछ भी मुझे दुबारा पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी। एक शिक्षक की कामयाबी शायद यही है और संजय सर ने यह कामयाबी पा ली थी। यानी एक सफल पत्रकार एक सफल शिक्षक भी था।

 

संजय सर अध्यापन में तो कुशल है ही, उनके अन्दर व्यक्ति को पहचानने की अद्भुत कला भी है। शायद पत्रकारिता के व्यवसाय ने उनमें यह कला विकसित की होगी। उन्होंने कई बार मेरे मन को पढ़कर मुझे रास्ता सुझाया था। भविष्य के प्रति मेरी चिन्ता, करियर को लेकर उधेड़बुन और व्यवसाय के अवसरों को लेकर मैं अक्सर गम्भीर हो जाया करती थी। सभी विद्यार्थियों के बीच वे मेरी उलझन भांप लिया करते थे और मेरे पूछने से पहले ही मुझे मेरे हर प्रश्न का उत्तर मिल जाता था। मेरी कई उत्सुकताएं उन्होंने इतनी सहजता से शान्त की थी कि मैं उनकी सबसे प्रिय शिष्या होने का गुमान करने लगी। मुझे उनमें गुरू के साथ साथ एक दोस्त, एक भाई और एक पिता की छवि दिखने लगी थी। मेरे इस भरोसे को तब और बल मिला जब मेरी मुलाक़ात सर की धर्मपत्नी से हुई। मिसेज भूमिका द्विवेदी को देखकर ऐसा लगा मानो एक सुन्दर राजकुमारी सामने खड़ी हों। और कुछ देर उनसे रूबरू होने के बाद यकीन हो गया कि संजय सर के लिए इससे अच्छा Match हो ही नहीं सकता था। वे ख़ुद जितने सीधे सरल और खुशमिजाज़ हैं उनकी Better half भी उनसे कम नहीं। पहली मुलाक़ात में ही उनसे जो स्नेह, जो अपनापन मिला उसके सामने मेरी श्रध्दा भी छोटी पड़ गई। मैंने उसी पल महसूस किया कि जन्म के रिश्ते तो हमारी नियति हैं मगर ऐसे अनमोल रिश्ते हमारी किस्मत। संजय सर के रूप में एक तरफ जहां मुझे एक अच्छा गुरू, एक प्यारा दोस्त और एक ज़िम्मेदार पिता मिले वहीं भूमिका मैडम से एक बड़ी बहन, एक मां का स्नेह मिला। आज उनसे हज़ारों मील दूर रहकर भी मेरे आंसू... मेरी हंसी... मेरी हर बात सर भांप जाते हैं। दो साल के उस प्रवास ने मुझे ज़िन्दगी भर के एक अटूट बंघन में बाँध दिया ।

(अप्रैल 29, 2008)

  लेखिका प्रज्ञा चैनल, दिल्ली में कार्यरत हैं

 

  

 

 

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