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काश!
आप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में होते

-डिविल
एकान्त

गधे खीर खाते हैं... जलवा बरकरार है...और संपादक जी... एवं डरो
मत,
काम करो जैसे जुमलों पर अपना कापीराइट रखने
वाले (भले ही अपनी प्रकाशित छह किताबों का कापीराइट न रखते हो)
शख्स का नाम संजय द्विवेदी ही हो सकता है। जिन्हें देख मुझे
शायर बशीर बद्र का एक शेर ध्यान आता है - 'अजीब
शख्स है, नाराज होकर भी हंसता है। मैं चाहता हूं,
नाराज रहे तो नाराज ही दिखे।
कम उम्र के सम्पादकों में संजय जी का कोई सानी नहीं। जहां तक
मैं उनके परिचितों को देखता हूं तो मुझे इस बात का एहसास होता
है कि उनके साथ का हर व्यक्ति जिससे वे लगाव दिखाते हैं,
उसे इस बात कि गलतफहमी हो जाती है कि वही उनका
खास है। एक दशक से अधिक समय से मैं यही देखता आ रहा हूं। लेकिन
राज की बात यही है कि ऐसा कुछ होता नहीं है।
भाई साहब (संजय जी) से वैसे तो मेरी एक दशक में तीन खास
मुलाकातें हैं। जिसमें पहली भोपाल की। दूसरी रायपुर,
स्वदेश के जमाने की और फिर एक लम्बे अंतराल के
बाद हरिभूमि के स्थानीय संपादक के रूप में। भोपाल की भेंट तो
मेरे कुछ लिख कर छप जाने के शौक की परिणति थी। भाई साहब उन
दिनों स्वदेश के संपादकीय पेज का काम देखते थे। इसलिए कुछ लिख
लेने के बाद इतना तो रहता था कि छप जाएगा। मेरे सीनियर होने के
साथ ही भाई साहब का एक विशेष अनुराग भी मैं अपने लिए (दूसरों
की तरह) देखता था। जो कि प्रेस कॉम्प्लेक्स के पोहा-जलेबी के
रूप में दिखाई देता था। साथ ही मैंने उन दिनों इनके काम के
प्रति इनकी लगनशीलता भी देखी है। गजब के स्टेमिना के चलते भाई
साहब पढ़ते हुए, रोज कई आलेख भी लिख
मारते थे, जोकि उनके समकालीन छात्रों
में इर्ष्या का भी कारण था।
दूसरी भेंट में मैने इन्हें रायपुर स्वदेश के स्थानीय संपादक
के रूप में पाया। डिग्री लेकर अब तो मैं समङा गया था कि इस
क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए गाडफादर जैसे लोगों की जरूरत
होती है। डिग्री को कोई देखता नहीं,
हां ऐसा आदमी जरुर आपके पहचान का हो जो जानता
हो कि आपने कुछ किया है। ऐसे में मेरे सामने सिर्फ एक ही चेहरा
था, और वह था भाई साहब का। मैं बिना
किसी संकोच के सीधे उनके पास पहुंच गया और नौकरी शुरू। स्वदेश
के संपादकीय दायित्व के बाद भी मैंने इस दौरान भाई साहब को
प्रथम पेज को मैनुअल लगाते देखा है। सच कहूं तो उतना अच्छा पेज
मैं आज एडीटर जैसे साफ्टवेयर के आ जाने के बाद भी नहीं लगा
पाता। इसकी चर्चा आज भी मैं अपने सहयोगियों एवं कई ऐसे लोग से
जो अपने को भाई साहब का एकदम खास होने की बात कहते हैं,
उनकी ज्ञानवृध्दि के लिए बताता रहता हूं।
लेकिन स्वदेश में काम करते दो माह बाद उन्हें शायद लगा कि मुझे
उनके पास मजा नहीं आ रहा ऐसे में उन्होंने स्वयं ही मुझे
नवभारत, मुंबई भेजने की व्यवस्था की।
ऐसा दुस्साहस करते हुए मैंने बहुत कम संपादकों देखा है। लीक
में रहकर अपने काम को बखूबी अंजाम देने की अदा में माहिर भाई
साहब के इस फैसले ने मेरे उनके बीच जरूर दूरियां बढ़ा दी,
मगर संबंधों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
मैं बहुत जल्द ही नवभारत, मुंबई की
नौकरी भी छोड़ आया। बकौल भाई साहब मैं भाग आया। मगर इस बार उनके
पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। इस बीच भाई साहब ने भी
मुंबई की ओर रुख कर लिया और मैं सामने आने से बचता रहा। मैं
फिर माखनलाल विवि से इलेक्ट्रानिक मीडिया में मास्टर डिग्री
करने भोपाल पहुंचा। इसके बाद जब भी मुझे पता चलता कि भाई साहब
भोपाल के रास्ते गोरखपुर जा रहे हैं,
तो न चाहते हुए भी मिलने का साहस कर ही जाता। अच्छी बात यह थी
कि भीड़ इतनी होती कि वह मुझे ज्यादा कुछ नहीं कह पाते थे। अपने
वरिष्ठ छात्रों में इतना लोकप्रिय मैंने और किसी छात्र को नहीं
देखा है। मैं आज भी दावे से कह सकता हूं कि भाई साहब को लेने
और छोड़ने भोपाल में छात्रों की अच्छी खासी भीड़ आ जाती थी और आज
भी यही सुनता हूं कि स्थिति जस की तस है।
तीसरे दौर में वे हरिभूमि में मेरे स्थानीय संपादक हैं। जहां
अपने दायित्वों के निर्वहन के बाद भी बाकी लोगों से उनका लेखन
आज भी ज्यादा है। इस बारे में यहां मैं एक बात कहूं तो
पत्रकारिता में लोग एकादशी,
पूर्णिमासी या आमवस्या लेखन करते हैं। लेकिन
भाई साहब का लेखन परिवा से पूर्णिमासी तक सतत् जारी ही रहता
है। मगर मुझे आज भी उनके पहले के ही लेख ज्यादा अच्छे लगते
हैं। मैंने उनकी कोई किताब नहीं पढी,
लेकिन उनके कोई लेख छोड़े भी नहीं हैं। मैं आज भी उनसे यह बात
पूछ ही बैठता हूं कि ये विषय आपके दिमाग में सूङाते कैसे हैं?
आज भाई साहब कि व्यस्तता बहुत अधिक हो गई है
मगर वे संबंधों को लेकर आज भी लोगों को उतने ही मुगालते में
रखे हुए हैं। जितना मैं एक दशक पहले से देखता आ रहा हूं। वैसे
तो मैं उनके पास सिर्फ काम से ही बैठता हूं,
पर उनका स्नेह मैं भोपाल वाले उसी भाई साहब के
जैसा ही पाता हूं। उनके साथ इतने दिनों मैंने यह पाया है कि वे
अक्सर मुझे त्योहारों पर छुट्टी देने से इंकार कर देते हैं और
त्योहारों को मैं अक्सर मिस कर देता हूं। मुझे इस बात की भी
बड़ी खुशी होती है कि, न ही उन्होंने
मेरी कोई बात क्रास की है और न ही मैंने। कभी-कभी मुझे लगता है
कि यदि भाई साहब लड़की होते तो क्या होता?
खैर...
स्वदेश,
नवभारत एवं दैनिक भास्कर जैसे अखबारों के साथ
ही रीड र जैसे महत्वपूर्ण पद पर काम को अंजाम दे चुके भाई साहब
को देख मुझे यह लगता है कि वे शायद अब ठहर जाने के मूड में आ
गए हैं। जो कि मेरे लिए घातक है।
एमए(हिन्दी) करते समय मैंने निराला कि एक कविता पढी थी जिसका
सही अर्थ लोग अपने-अपने ढंग से लगाते हैं,
जिसे मैं भाई साहब के लिए लिख रहा हूं,
शायद वो इसका अपने अनुसार अर्थ निकाल लें।
बांधो न नाव इस ठांव बन्धु।
पूछेगा सारा गांव बन्धु॥
यह ठांव वहीं,
जहां फंसकर।
वह कभी नहाती थी धंसकर॥
कांपते थे उसके पांव बन्धु।
बांधो न नाव इस ठांव बन्धु॥
उन्हें देख मैं अक्सर यही सोचा करता हूं कि काश! भाई साहब
इलेक्ट्रानिक मीडिया में होते...
(अप्रैल 10, 2008)
युवा पत्रकार,
रायपुर
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