|
'तुम,
तुम हो यार...!
-पुरूषोत्तम
कुमार
क्या
इस बात पर यकीन कर पाना आसान है कि आप दस सालों में किसी से
मात्र दो-तीन बार बात करें,
वह भी चंद सेकंडों के लिए और रिश्ते की ताजगी
बरकरार रहे, बिलकुल पहले की तरह?
आप उसके साथ वही सहजता महसूस करें,
जैसी दस साल पहले किया करते थे?
पता नहीं औरों का जवाब क्या होगा,
लेकिन मेरे
लिए तो जवाब हां में है।
अब भी आपको यह बात शायद आसान न लगे। लेकिन जब बात संजय
द्विवेदी की हो,
तो आपको मानना ही होगा कि मैं सच कह रहा हूं।
दस सालों के बाद भी मैं कितना सहज रह पाया,
पता नहीं। लेकिन
संजय को मैंने बिलकुल सहज पाया। इतने लंबे अरसे के बाद भी वही
संजय। किसी के भी दिल को छू लेने वाला। आपको प्रभावित करने के
लिए किसी भी हद तक गुजर जाने की इच्छा रखने वाला।
अक्सर बीते दिनों को याद करना अच्छा सा लगता है। खासकर
स्कूल-कालेज व विश्वविद्यालय के दिन। पहली बार संजय से हमारी
मुलाकात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय
के छोटे से परिसर में हुई थी,
जब हम सब पत्रकारिता स्नातक की प्रवेश परीक्षा
देने आए थे। पहली बार देखा तो यही लगा कि बस फेंकने वाला इंसान
है। फिर हम कुछ अंतराल के बाद क्लासरूम में मिले। धीरे-धीरे,
जैसे-जैसे मैं उसे जानता-समझता गया,
लगा कि उस दिन मैं कितना गलत था। यह भी लगता
था कि इतनी कम उम्र में इतनी गहराई जिसके अंदर हो,
वह बाहर से इतना अगंभीर क्यों दिखता है। शायद
इसे ही स्वभाव कहते हैं। बहरहाल, ये
शुरूआती बातें थीं। बाद में तो संजय द्विवेदी सबके चहेते हो
गए। हमारे भी। उसका यह जुमला उसी पर फिट बैठता है-'तुम,
तुम हो यार।
दोस्तों की दरियादिली हमेशा अच्छी लगती है और संजय द्विवेदी
कई मामलों में बेहद दरियादिल इंसान रह चुके हैं। अब का पता
नहीं। तब के संजय से कोई दोस्त जान भी मांगता तो देता या नहीं,
पता नहीं पर मना नहीं करता। तुम्हारे लिए जान
भी हाजिर है यार...। यह जुमला भी उससे सुनना वाकई बहुत अच्छा
लगता था। सिर्फ यह जुमला ही क्यों?
संजय से तो कुछ भी सुनना अच्छा ही लगता था। चाहे वो किसी के
शेर हों या फिर उसकी या किसी और की कविताएं। कई बार तो मैं समझ
नहीं पाता था कि इतनी कम उम्र में ऐसी प्रतिभा?
यह इंसान आखिर हम जैसे सामान्य लोगों के बीच
कैसे आ गया? बहरहाल,
संजय अब जिस मुकाम पर हैं,
उसे देखकर एक बार
फिर लगता है कि हम गलत थे। दूसरों को गलत साबित करना उसकी
फितरत में जो शामिल है।
संजय जितना अच्छा लिख सकता है,
उतना ही अच्छा बोल भी सकता है। बोलने और लिखने
पर समान अधिकार बहुत कम देखने-सुनने को मिलता है। लेकिन संजय
का लिखा पढ़ना और उसे बोलते सुनना,
दोनों अद्भुत अनुभव होता है। बहुत दिन हो गए संजय का लिखा कुछ
पढ़े हुए। क्या-क्या बदला,
कह नहीं सकता पर उन
दिनों संजय के लिखे को एक बार पढ़ना शुरू कर देने पर आप बिना
खत्म किए रुक नहीं सकते थे। भाषा और शैली इस कदर प्रभावकारी कि
तथ्यों की कमी नहीं खटकती। यही हाल उनकी बातों का था। बातों
में ऐसा प्रवाह कि हम उसे अपने कमरे में घंटों सुनते रहते थे।
कई बार ऐसा हुआ कि रात को बातचीत करने बैठे तो सुबह होने के
बाद ही खत्म हुई।
इतना गुणवान होने के बावजूद उसमें कोई दंभ था भी तो वह दिखता
नहीं था। आप जितने सहज होकर मिलें,
उससे कहीं ज्यादा सहजता आप उसमें पाएंगे। मुङो
याद है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दिनों में संजय एक बार हमारे
विभागाध्यक्ष श्री कमल दीक्षित जी से काफी देर तक यह आग्रह
करता रहा कि वे एक बार कह दें कि वह (संजय) मुझसे (पुरूषोत्तम)
से अच्छा है। उस दिन तो उन्होंने उसे अच्छा नहीं कहा। (शायद
मेरे प्रति स्नेह के चलते,
वरना बिना किसी
संदेह के संजय तब भी सबसे अच्छा था।) लेकिन आज अगर संजय उनसे
यही आग्रह करे तो वे इस तथ्य और सत्य को झुठला नहीं पाएंगे।
संजय अक्सर अपने लेखों में एक शब्द का इस्तेमाल किया करते थे-
'तनदेही (अब भी करते होंगे पर दुर्भाग्य कि
बहुत दिनों से उनका लिखा हुआ कुछ पढ़ नहीं पाया।)संजय के ही
शब्द उधार लेकर कहूं तो वह जितनी 'तनदेही
के साथ अपने काम में जुट जाते हैं, वह
मिसाल देने के लायक है। यही वजह है कि संजय अपने कर्मक्षेत्र
में लगातार आगे बढ़ते रहे। सच कहूं तो संतोष भी होता है कि संजय
ने अपनी प्रतिभा को जाया नहीं होने दिया। उन दिनों में जब
हमारा संपर्क नहीं के बराबर रहा, संजय
की कुछ किताबें भी आईं। पत्रकारिता के पेशे में रहते हुए लेखन
के लिए समय निकाल लेना किसी बाजीगरी से कम नहीं। वाकई संजय
बाजीगर हैं। तरक्की की राह पर संजय लगातार आगे बढ़ते रहें,
ऐसी
शुभकामनाओं के साथ...।(मई6, 2008)
लेखक अमर उजाला,
देहरादून में समाचार संपादक हैं।
|