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जो
लगते अपने

-सौरभ
तिवारी
यूं तो संजय जी से करीब
12
वर्षों से जान-पहचान है किन्तु 'पहचान
पुरानी होने के बावजूद उन्हें वास्तविक रूप से पिछले डेढ़ वर्ष
में ही 'जान पाया। जब मैं वर्ष
1996 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय
पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में
स्नातक कर रहा था, वे वहां एम.जे. कर
रहे थे। वहां करीब साल भर उनका साथ मिला। बतौर सीनियर वे मेरे
सर्वाधिक प्रिय लोगों में से थे। वरिष्ठता की गरिष्ठता उनमें न
तब थी और न अब है जब वे मेरे संपादक हैं।
भोपाल में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान तब विश्वविद्यालय में
छात्रसंघ जैसी संस्था न होने के बावजूद वे हमारे अघोषित नेता
थे। विश्वविद्यालय की गरिमा को नई उंचाई देने और छात्र हितों
को लेकर उसी दौरान चर्चित आंदोलन चला था जिसकी अगुवाई संजय जी
ने ही की थी। दरअसल,
उनमें नेतृत्व का नैसर्गिक गुण है। लेकिन उनके
अंदर का 'नेता उस नेतागिरी को नहीं
जानता जिसे लेकर आज यह बिरादरी बदनाम है। सामूहिकता को साधने
का कौशल उन्हें खूब आता है। विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान
संजय जी सर्वाधिक लिखाऊ विद्यार्थी के रूप में जाने जाते थे।
एक ही दिन में दो- तीन आलेख तो वे यूं ही लिख डालते थे। उस
दौरान हम नवोदित पत्रकारों को उनका यह लेखन कौशल कौतुहल जगाता
था। एम.जे. करते हुए ही वे दैनिक भास्कर,
भोपाल में बतौर सहायक संपादक काम भी कर रहे
थे। वे शाम करीब चार बजे नौकरी करने अखबार के दफ्तर चले जाते
थे और देर रात लौटते थे। दिन में कक्षा की औपचारिक पढ़ाई के बाद
वे जब भी दिखते तो अपने ही रंग में नजर आते थे। महफिलबाज तो वे
शुरू से ही हैं। विश्वविद्यालय के सामने स्थित रघु की चाय की
गुमटी में, हास्टल के किसी कमरे में,
उनके अपने किराए के मकान में या फिर चाहे
हास्टल मेस में, अक्सर उनका दरबार सजा
मिलता। अकबर के दरबार में तो सिर्फ नौ रत्न थे लेकिन वहां उनके
दरबार में रत्नों की कमी न थी। उनकी दरबार में कभी गीतों की
महफिल सजती तो कभी देश की समस्याओं पर चिंतन शिविर लगता। यहां
बताता चलुं कि संजय जी गाते बहुत बढ़िया हैं। यह लिखा पढ़कर संजय
जी भले नाराज हों लेकिन सच्चाई यही है कि वे हमें पाठयक्रमी
पढ़ाई के प्रति गंभीर कभी नजर नहीं आते थे। तो,
यह हम लोगों के लिए सदैव कौतुहल का विषय रहता
था कि संजय जी आखिर पढ़ते कब हैं। कौतुहल का हल तब मिल गया जब
संजय जी विश्वविद्यालय में सर्वाधिक प्राप्तांक हासिल कर
मा.गो. वैद्य स्मृति रजत पदक से सम्मानित किए गए।
पत्रकारिता की डिग्री हासिल कर हम अपनी-अपनी मंजिलों की ओर
निकल गए। करीब दस वर्ष तक फिर संजय जी से प्रत्यक्ष सम्पर्क
नहीं हो सका। बीच में एक बार रायपुर में एक
'माखनलाली
मित्र की शादी में उनसे भेंट हुई थी। तब वे रायपुर 'स्वदेश
के संपादक थे। उसके बाद करीब आठ-नौ
वर्षों तक उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। लेकिन गाहे-बगाहे ऐसी खबर
मिलती रहती थी जिससे मालूम पड़ता था कि पत्रकारिता जगत में संजय
द्विवेदी अब एक पहचाना नाम हो चुका है। अक्टूबर 2007
में मैं उनके सीधे सम्पर्क में तब आया जब मैने
'हरिभूमि रायपुर में प्रवेश किया। उनके
सहकर्मी (अधीन लिखना इसलिए अनुचित है क्योंकि ऐसा मुङो लगता
नहीं है) के रूप में काम हुए मैं यह जान पाया कि आखिर उनमें
ऐसा क्या है जिसकी वजह से वे उम्र की एवज में कहीं ज्यादा यश,
सम्मान, प्रतिष्ठा और
उपलब्धि हासिल कर सकने में सफल रहे।
एक लेखक के रूप में उनके लिखे की मूल्याकंनीय समीक्षा फिर कभी
किसी अन्य प्रसंग अवसर पर करूंगा,
यहां मैं उनके सम्पादकीय व्यक्तिव पर ही
प्रकाश डालना चाहता हूं। समाचार पत्र उद्योग के प्रबंधकीय
प्रभुत्व के इस दौैर में जबकि सम्पादक की सत्ता और महत्ता का
लगातार अवमूल्यन हो रहा है, संजय जी
जैसे संपादक के मार्गदर्शन में काम करने का अवसर पाकर मैं खुद
को खुशकिस्मत मानता हूं। संजय जी मीडिया विमर्श के एक प्रभावी
हस्ताक्षर के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं। मीडिया
की शुचिता और आदर्श के लिए उनकी चिंता महज व्याख्यानों और
लेखों तक सीमित न रहकर उनके व्यावहारिक काम-काज में भी
दृष्टिगोचर होती है। अप्रमाणिक,
व्यक्तिगत दुराग्रही और एकपक्षीय खबरों से उन्हें सख्त परहेज
है। उनकी कोशिश अखबार में सकारात्मक खबरों के लिए अधिकतम स्थान
दिलाने की होती है। उनकी एक बड़ी खूबी जोखिम लेने की हद तक
अपने सहयोगियों की काबिलियत पर भरोसा करने की है। मैंने हमेशा
उन्हें अपने सहयोगियों को सकारात्मक प्रोत्साहन देते देखा है।
वे किसी जिम्मेदारी को इतने भरोसे के साथ सौंपते हैं कि उस
भरोसे को कायम रखने का नैतिक दबाव हमारे आत्मविश्वास को जगा
देता है। यही वजह है कि उनके संपादकीय नेतृत्व में सहयोगी टीम
प्रयोगधर्मिता के साथ काम को बेहतर बनाने की कोशिश में जुट
जाती है। उनके विश्वास को कायम रखने हमारे लिए जरूरी हो जाता
है कि हम खुद को बेहतर रूप में साबित कर सकें। हालांकि परिणाम
अपेक्षानुरूप नहीं आने पर जब-तब फटकार भी मिलती है। लेकिन वह
फटकार भी प्रोत्साहन में लिपटी रहती है। 'डरने
की जरूरत नहीं है तकिया कलाम के साथ वे नई जिम्मेदारी सौंपने
का दु:साहस करते रहते हैं। किसी बात का रंज और मलाल रखना तो
जैसे संजय जी जानते ही नहीं।
संजय जी का हर वक्त अपने लेखकीय कर्म में संलग्न रहना सदैव
प्रेरित करता है। उनका एक साथ कई आयामों को साधने का हुनर उनके
लेखन प्रवृत्ति के अलावा संबध्द प्रतिबध्दता को प्रमाणित करता
है। बात चाहे सम्पादकीय कत्तव्य निर्वहन से समय निकाल कर
त्रैमासिक पत्रिका
'मीडिया
विर्मश के प्रकाशन की हो या फिर विभिन्न समारोहों और गोष्ठियों
में सहभागिता की, वे सदैव कुछ न कुछ
करते दिखाई देते हैं। यह देखकर संतोष आश्चर्य होता है कि लेखन
के प्रति उनकी भूख अब तक बरकरार है। ईश्वर उनकी यह भूखव्यस्तता
कायम रखे। हां! एक बात जरूर खटकती है कि संजय जी की
महत्वाकांक्षाओं पर संतोष का भाव कुछ ज्यादा ही गहराता जा रहा
है। वजह चाहे पड़ाव को मंजिल मान बैठने का भ्रम पाल लेने की हो
या फिर चाहे परिस्थितियों का तकाजा,
लेकिन यूं आकांक्षाओं से संतृप्त होकर उन्होंने बेहतर
संभावनाओं के दरवाजे उढ़का रखे हैं।
(मार्च 1, 2008)
लेखक हरिभूमि रायपुर के सेंट्रल डेस्क इंचार्ज हैं
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