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सागर जैसे हैं
मेरे सर!
-यशवंत
गोहिल
यह उन दिनों की बात है जब हम गुरू घासीदास विश्वविद्यालय,
बिलासपुर में छात्र थे। उस दिन यूनिवर्सिटी
में हम सारे विद्यार्थी रोमांचित थे। बीजेएमसी में प्रवेश लेने
का नया-नया उत्साह था। सरस्वती पूजा थी। हमने कक्षा में
पूजा-अर्चना के लिए मां सरस्वती की तस्वीर को यथोचित स्थान पर
रखा और डा. गोपा बागची (विभागाध्यक्ष) को आमंत्रित करने गए।
उनके साथ दफ्तर में एक 'युवा बैठे
थे, जिसे हमने देखा और अनायास ही
उनकी तरफ से एक चुंबकीय शक्ति का अनुभव हुआ। हमने उनसे कुछ
नहीं कहा। मैडम से कक्षा में आने का आग्रह किया और मैडम उन्हें
अपने साथ कक्षा में ले आईं।
चूंकि
वे मैडम के साथ कक्षा में आए थे,
उनका सम्मान करना भी जरूरी था। हमने अपने
'प्रोटोकाल सहपाठी से कहा: '
इंतजाम करो। जैसे-तैसे उनके सम्मान का
इंतजाम किया गया। अभी तक हमें उनके बारे में कुछ भी नहीं मालूम
था। औपचारिकता की पहली कड़ी में मैडम ने उनसे परिचय कराया:
' ये हैं श्री संजय द्विवेदी जी।
संप्रति दैनिक भास्कर में समाचार संपादक के रूप में कार्यरत
हैं और समाचार लेखन और पृष्ठसज्जा
के विषय में आपका मार्गदर्शन करेंगे। तब तक वे मौन बैठे थे और
बड़ा ही गंभीर भाव चेहरे पर था। मैडम ने उन्हें कार्यक्रम के
मंच पर आमंत्रित किया कि वे हमें कुछ संबोधन दें। डायस पर जब
वे पहुंचे तो उनके मुखारबिंदु से निकलने वाले पहले वाक्य
थे....
'जिंदगी
की रफ्तार बहुत तेज है। आपमें से हर कोई नई संभावनाओं,
नए अवसरों और नए निर्माण के लिए यहां स्वयं को तैयार करने आए
हैं। लेकिन इसके लिए आपको जिंदगी की रफ्तार के साथ-साथ उन
लोगों से भी प्रतियोगिता लेनी है जो आपके पीछे तेजी से दौड़े
चले आ रहे हैं। आपको उनसे एक निश्चित दूरी रखने के लिए भी एक
निश्चित रफ्तार से दौड़ना पड़ेगा। इसलिए आगे निकलने के लिए जान
लीजिए,
आपको कितनी मेहनत करनी है?
उनके
इतना कहने के बाद वे अधिकांश विद्यार्थियों के दिलों में अपने
लिए जगह कायम कर चुके थे। यह उनसे हमारी पहली मुलाकात थी लेकिन
उनके जाने के बाद भी उनकी उपस्थिति उस माहौल में दिखती रही।
हममें से अधिकांश उनके बारे में ही चर्चा करते रहे और कहीं न
कहीं हममे से कुछ उनमें अपना आदर्श तलाशने लगे। पहली मुलाकात
में वे जितने धीर-गंभीर लगे,
उनकी क्लास के दौरान पता चला कि वे आकाश की
तरह उतने ही खुले हुए हैं। उनसे हम जितना बात करते,
हमें उनके उतना ही नजदीक जाने का मन करता।
क्लास में जब उनके साथ कुछ दिन बीत गए तो इस बात का एहसास तो
सभी को हो ही चुका था कि वे एक शिक्षक की भूमिका में होते हुए
भी एक मित्र ही हैं। लेकिन दोनों के बीच की सीमारेखा को
उन्होंने जितनी अच्छी तरह से समझा,
उतनी ही अच्छी तरह से उन्होंने बिना कुछ
कहे अपने विद्यार्थियों को भी
समझा
दिया। यह उनकी बहुत बड़ी खूबी है कि वे तमाम रिश्तों को एक हद
में रखते हुए समय-समय पर सामने वाले को भी उसका आभास कराते
रहते हैं। इसे मैंने उनके साथ काम करने के दौरान भी महसूस किया
है।
मेरा
उनसे जुड़ाव विद्यार्थी काल में ही हुआ। हम लोग बस के इंतजार
में कैंपस के बाहर खड़े रहते थे। चूंकि सभी को शहर की तरफ ही
रुख करना होता था,
एक बार वे पीछे से आए और कहा: 'बैठ
जाओ। इस 'बैठ जाओ में आदेश,
अधिकार और स्नेह तीनों एक साथ नजर आया।
मैं कुछ कह नहीं सका और उनके पीछे बैठ गया। रास्ते में पहली
बार कुछ निजी बातें भी हुईं। इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा।
दोस्तों ने इसके लिए कई बार
मुझे
चिढ़ाया भी,
कुछ टांट भी कसे,
लेकिन मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। मैं
स्वयं ही इस बात का इंतजार करने लगा कि कब सर कहें और मैं
उनके साथ जाऊं। दरअसल सच्चाई तो यह थी कि हममें से अधिकांश इस
प्रतियोगिता में शामिल थे। बात सिर्फ इतनी ही थी कि हम लोग
ज्यादा से ज्यादा समय सर का साथ चाहते थे।
इसी
दौरान मेरे कहने पर सर ने
मुझे
भास्कर में ट्रेनिंग के लिए अवसर उपलब्ध कराया। एक बार काम के
दौरान ही अनुराधा (सहपाठी) दफ्तर आई तो सर ने
मुझे
बुलाया और हम दोनों को घर ले गए। यह पहला अवसर था उनके घर जाने
का। पंजाबी कालोनी में जब हम घर पहुंचे तो ट्रे पर पानी के
ग्लास और मिठाई की प्लेट के साथ स्नेहिल भाव से मुस्कराता हुआ
एक चेहरा दिखाई दिया। सर ने परिचय कराते हुए कहा :
'ये
मेरी धर्मपत्नी हैं। चूंकि सर को मैंने शुरू से ही एक 'गुरू
के रूप में देखा था,
मुझे
उनमें
'गुरूमाता
की छवि ही दिखाई दी। मैंने उनके पैर छुए और चुपचाप बैठा रहा।
पूरी बातचीत के दौरान सिर्फ अनुराधा ही बात करती रही। अंत में
घर से निकलते समय मैंने केवल इतना ही कहा :
'मैं
यह समझ नहीं पा रहा कि आपको क्या संबोधन दूं। इसीलिए चुप बैठा
था। मैं आपको दीदी कहूं या भाभी?
वे हंस पड़ीं और कहा
'तुम
मुझे दीदी ही कहना। बस तबसे वे शाब्दिक अर्थ में तो मेरी दीदी
ही हैं लेकिन मैं उसका तात्विक अर्थ आज भी
'गुरूमाता
ही मानता हूं। बहरहाल,
अखबार में काम करने का यह मेरा पहला अनुभव था। श्री दिवाकर
मुक्तिबोध बिलासपुर संस्करण के संपादक थे। उन्होंने मुझसे
बातचीत करने के बाद प्रांतीय डेस्क में बैठने को कहा था। यहां
आकर मालूम हुआ कि अखबार की दुनिया पत्रकारिता की पुस्तकों में
छपे हुए शब्दों से काफी आगे निकल चुकी है। चूंकि मैंने कभी काम
किया नहीं था और इस जगत के विषय में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी,
मुझे वेतन बहुत कम लगा। मैं जानता था कि भास्कर जैसे समूह ने
मुझे यह अवसर किसके माध्यम से दिया है,
इसलिए संकोचवश चुपचाप काम करता रहा। इसी बीच संजय सर को किसी
विषय पर व्याख्यान के लिए वाराणसी आमंत्रित किया गया और मैंने
कुंठित मन से दिवाकर जी से कहा कि मैं अब और काम नहीं कर
पाऊंगा। मुझे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करनी है। लेकिन जब
सर लौटे तो उन्हें आश्चर्य के साथ गुस्सा भी बहुत आया लेकिन
उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। कभी-कभी किसी का कुछ न कहना हृदय को
अधिक चोट पहुंचाता है। ऐसा ही सर के कुछ न कहने पर हुआ। चूंकि
मैंने बीजेएमसी में भी टाप कर लिया था। दोस्तों ने पार्टी रखी।
इस पार्टी में एक दुर्घटना के कारण मेरे पांव में गहरे जख्म पड़
गए। जिसका मैं इलाज नहीं करा रहा था। इसके लिए माताजी ने सर को
फोन किया और फौरन घर आ गए। चेकअप के बाद पता चला कि पैर
फ्रैक्चर है तो अस्पताल में उन्होंने मेरे लिए उपचार की
व्यवस्था करवाई। दीदी रोज अस्पताल में कम से कम एक बार मिलने
आतीं। वे आत्मीय तो थे लेकिन अब मेरे लिए वे पूज्यनीय भी हो गए
थे। मेरा अंर्तमन सदैव उनकी पूजा किया करता। मैंने यह निश्चय
कर लिया था कि मैं स्वयं को उन्हें सौंप दूंगा। मुझ पर मुझसे
ज्यादा उन्हें अधिकार हो,
ऐसी भावना मेरे अंर्तमन में हमेशा रही।
इसके
बाद उन्होंने
मुझे
दोबारा भास्कर में अवसर दिया। इस बार मैं दृढ़ निश्चय करके
पत्रकारिता की दहलीज पर कदम रख रहा था। सर के कहने पर मैंने
एमजेएमसी में प्रवेश ले लिया। यहां भी कुछ दिनों तक वे पढ़ाने
आए। वे जैसे रहते हैं,
वही उनका मूल चरित्र है और किसी भी जगह
उसमें दोहराव नहीं है। यदि उनके मन में कोई क्लेश है,
तो यह दीदी के अतिरिक्त शायद और कोई नहीं
जान सकता और मेरा तो यह भी अनुमान है कि कभी-कभी तो खुद दीदी
भी नहीं। वे जितने बाहर से खुले हुए हैं,
उतने ही अंतर्मुखी हैं। बहरहाल,
मेरी जीवन शैली बदल चुकी थी। अपनी आदतों
में मैं सर को ही पाता था। उनके जैसे बनने की तमन्ना ने उन्हें
मुझ
पर हावी कर दिया था। मैं भी कभी सोचता कि कहीं स्प्लिट
पर्सनाल्टी का शिकार तो नहीं हो जाऊंगा..?
दरअसल यह उनके प्रति मेरा प्रेम था और कुछ
भी नहीं। उनके कुछ डायलाग मैं हमेशा घर में,
बाहर, दोस्तों
के बीच बोला करता...'कौन जाने किस
घड़ी वक्त का बदले मिजाज, इनाम उसी
का निकलता है जो टिकट खरीदता है..., 'किसकी
मजाल है, जो रोके दिलेर को,
आफत में घेर लेते हैं कुत्ते भी शेर को...।
सर हमेशा इसे कहा करते और उनका अंदाज बड़ा ही निराला होता। पहली
लाइन खुद बोलते और दूसरी लाइन सामने वाले से कहलवाते और उसके
बाद जोर से ठहाका लगाते।
अब
तक मैं उनका सबसे प्रिय पात्र होने का गुमान करने लगा था और इस
भ्रम में भी जीने लगा था कि वे
मुझसे
ज्यादा किसी को नहीं चाहते। उनके साथ रहने वाला शायद हर कोई
यही चाहता हो। मैंने यह पाया कि या तो सर का किसी से कोई संबंध
रहता नहीं और अगर होता है तो वे उसे पूरी शालीनता,
निश्छल,
निर्विकार, एकभाव और पूरे विश्वास
के साथ निभाते हैं। 'नारिकेल समा
खलु: साना... का सुभाषित वाक्य उन पर सटीक बैठता है। वास्तव
में वे नारियल की तरह ही बाहर से कठोर और अंदर से नरम और मीठे
हैं। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक उन्होंने दैनिक भास्कर छोड़ने
का निर्णय लिया और रायपुर में दैनिक हरिभूमि के समाचार संपादक
हो गए। इस कारण उन्हें बिलासपुर छोड़ना पड़ा। मेरा हृदय बार-बार
उनकी अनुपस्थिति में अपने अस्तित्व की कल्पना कर रहा था और
इसमें मैं स्वयं को शून्य पा रहा था। मन में तो यही चलता रहा
कि कैसे उन्हें रोक लूं..। लेकिन यह सिर्फ मेरे मन में ही नहीं
चल रही थी...। यह उन सभी के मन की बात थी जिन्हें वे जानते थे
और उन्हें जो जानते थे।
उनके
रायपुर जाने के बाद भी उनसे लगातार संपर्क बना रहा। हरिभूमि
में मैं उनके लेख पढ़ा करता।
'द
संडे टॉक
उनका कालम चला करता था। जिसमें विभिन्न राजनीतिक हस्तियों के
साक्षात्कार होते थे। इसी बीच पता चला कि वे कुशाभाऊ ठाकरे
पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जा रहे हैं। यह निर्णय भी लोगों
को विस्मय में डालने वाला लगा। कई लोगों ने कहा कि एक अच्छा
संपादक,
शिक्षक की भूमिका में खुद को कैसे ढाल
पाएगा। लेकिन उन लोगों को यह बात नहीं मालूम थी कि वे संपादक
होते हुए भी सदैव एक शिक्षक की ही भांति व्यवहार किया करते थे।
गलतियों पर उनसे साथियों को ऐसी डांट मिलती थी कि बाहर से
देखने वालों को लगता कि अगला तो गया काम से..। लेकिन अगले ही
पल उस साथी के लिए मेज पर चाय रखी रहती और थोड़ी देर बाद वह
मुस्कराता हुआ उनकी केबिन से बाहर निकलता। यह उनका अपना अनोखा
अंदाज है। साथियों को गलती का एहसास भी हो जाता,
वे उसे स्वीकार भी करते और संपादक की गरिमा
और बढ़ी हुई नजर आती। इतनी डांट खाने के बाद भी कभी किसी साथी
के मन में उनके प्रति दुर्भावना नहीं रही। वे इतने सरल हैं कि
कोई भी उन्हें बांध सकता है और इस बंधन से वे मुक्त भी नहीं हो
सकते। जिस किसी ने भी उनके लिए 'प्रेम
पाश का इस्तेमाल किया, वह अपने
लक्ष्य भेदन में सफल रहा। भौतिक सुख-सुविधाओं और नश्वर चीजों
के लिए उनमें कभी मोह नहीं रहा। उनकी इस सरलता में ही उनकी
भावुकता छिपी हुई है।
जिस
समय वे कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय गए थे वे काफी खुश थे।
बहुत ही कम समय में यहां के विद्यार्थियों के लिए भी वे
श्रध्देय हो गए थे। उनके जिस किसी छात्र से पूछो,
उनके लिए सर की छवि पूजा की मूर्ति ही लगती
थी। ऐसी ही उनकी दो छात्राएं थीं दीपा और शिखा। दोनों ही
आधुनिक विचारधाराओं में पली-बढ़ीं लगती थीं लेकिन उनका सर के
प्रति आदर और स्नेह वैसा ही पवित्र और पावन था जैसा पूजा के
धूप की महक। इसी तरह विश्वविद्यालय का एक और विद्यार्थी हेमंत
पाणिग्राही भी उनका प्रिय था। हम लोगों ने यदि अपनी श्रध्दा से
उनके हृदय में अपना स्थान बनाया है तो हेमंत ने अपने कर्मों
से। आज भी सर हमेशा हेमंत की तारीफ किया करते हैं। सिर्फ इस
कारण कि वह ऐसा युवक है जो बिना किसी स्वार्थ के किसी की भी
मदद के लिए कहीं भी कभी भी तैयार रहता है। उनके हृदय में
ऐसे
हेमंत के लिए स्थान का होना यह बताता है कि सर अंदर से कितने
निर्मल हैं। मेरा ऐसा विश्वास है कि हम सारे विद्यार्थी सर का
सानिध्य-सामीप्य चाहते हैं और सर हेमंत का।
सर
भावुक भी हैं और उनकी भावुकता इस बात का प्रमाण है कि वे कितने
संवेदनशील हैं। दैनिक हरिभूमि रायपुर और कुशाभाऊ ठाकरे
विश्वविद्यालय से उनकी विदाई इस बात का प्रमाण थी जिसमें उनकी
वाणी से अधिक बातें उनके नयन कर रहे थे। दोनों ही कार्यक्रमों
में सर,
उनके साथी और विद्यार्थियों की आंखें छलक
रहीं थीं। यह बात भी हरिभूमि के साथियों और विद्यार्थियों ने
ही बताई थी। यह दर्शाता है कि संबंधों की निकटता उन्हें कितनी
अधिक प्रिय है और उसका टूटन उन्हें भी तोड़ती है और इन संबंधों
की भौगोलिक दूरी उन्हें भी विचलित कर देती है।
कुशाभाऊ
ठाकरे विश्वविद्यालय के बाद वे पुन: दैनिक हरिभूमि रायपुर में
स्थानीय संपादक के रूप में आए और यह मेरा सौभाग्य था कि उनके
साथ ही
मुझे
भी हरिभूमि,
रायपुर में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ।
यह अवसर भी उन्हीं की देन थी। इस अवसर ने मेरा विश्वास इतना
अधिक बढ़ाया कि
मुझमें
कार्यक्षमता से अधिक मिथ्या दंभ आ गया। शिव पुराण के अनुसार एक
बार जब नारद जी को अपनी भक्ति और ब्रम्हचर्य पर घमंड हो गया था
तो शिव की कृपा से भगवान विष्णु ने श्रीपुर का निर्माण करके एक
सुंदर नारी के माध्यम से उनका घमंड तोड़ा था और उन्हें जगत में
हरिमुख (बंदर का मुख) दे दिया था,
जिससे उन्हें अपमानित होना पड़ा था। सर ने
भी मेरे मिथ्याभिमान को तोड़ा लेकिन कहीं भी
मुझे
अपमानित नहीं होना पड़ा बल्कि अपमान से पहले ही उन्होंने
मुझे
बचा लिया। दोनों में अधिक श्रोयस्कर कौन है,
कहने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ
ही दिनों के बाद दैनिक हरिभूमि रायपुर में ही बिलासपुर के
पत्रकार और मेरे साथी अनिल तिवारी भी आ गए। कई मामलों में हम
दोनों के विचार काफी मिलते-जुलते हैं और हम कुछ विषय विशेष पर
रातों-रात बात करते गुजार देते हैं। लेकिन इसके बाद भी मैं उन
पर कभी विश्वास नहीं कर पाता और इसी अविश्वास ने कई बार
मुझे
सर के सामने एक प्रश्नवाचक चिन्ह की भांति खड़ा किया। लेकिन सर
मुझे
और अनिल दोनों को ही भलिभांति जानते हैं। अनिल सर के बहुत
विश्वासपात्र भी हैं। शायद इसी कारण जब वे नहीं होते तो सर
मुझसे
उनके विषय में मजाक किया करते। ऐसा करके कदाचित् सर मेरे
अंर्तमन की बात जानने की कोशिश करते। सर मनोभावों को अच्छी तरह
से
समझते
हैं,
लेकिन उसका प्रदर्शन कभी नहीं करते। उनके
मन की बात को केवल वे ही जान सकते हैं,
पर उनके सामने जो होता है वह अधिक समय तक
छद्म रूप धारण नहीं कर सकता। यह निष्कर्ष मेरा और अनिल जी
दोनों का है। वैसे अनिल उन्हें 'हर
उम्र में हम उम्र मानते हैं। मतलब कि हर व्यक्ति के साथ उनका
सीधा संपर्क मुश्किल नहीं होता। वे सबके साथ घुलमिल जाते हैं।
इसी तरह हमारे एक अन्य मित्र प्रतीक वासनिक भी उन्हें अपना
मार्गदर्शक मानते हैं जिन्हें सर भी काफी स्नेह करते हैं। इसी
तरह एक अन्य मित्र पत्रकार हर्ष पांडेय के सामने भी जब उनका
जिक्र आता है, तो वे श्रध्दापूर्वक
ही उनका स्मरण करते हैं। यह केवल हम मित्रों की ही बात नहीं,
जिस किसी शख्स से उनकी मुलाकात होती है वह
उनका मुरीद बन जाता है। वास्तव में यह उनके व्यक्तित्व का ही
चमत्कार है।
इतने वर्षों तक उनके साथ रहने के बाद भी मैं स्वयं आज तक उनके
समक्ष सहज नहीं हो पाया। एक बार हम उनके रायपुर,
अवंति विहार स्थित घर पर बैठे थे। सर चाय
बना रहे थे। अचानक सर ने मजाक में कहा :
क्या माहौल है मेरे खिलाफ?
मैंने कहा: क्या होगा सर आपके खिलाफ।
उन्होंने कहा:
'तुम
इतने भौचक्के से क्यों रहते हो।
चौंका संप्रदाय के हो क्या?
मैंने कहा :
'नहीं
सर, दरअसल बात यह है कि मैं जब भी
आपके सामने आता हूं, असहज हो जाता
हूं। मेरी पूरी बाडी लैंग्वेज गड़बड़ा जाती है।
वास्तव
में यह सही भी है। इसी कारण मैं उन्हें
'बालि
कहता हूं जिसके सामने वाले की आधी ताकत वे खींच लेते हैं और इस
बात को वे लोग भी महसूस करते हैं जो उनके नजदीकी हैं। उनके मन
में अपने वरिष्ठ लोगों के लिए बहुत आदर है लेकिन वे कभी भी उस
आदर का दिखावा नहीं करते, वे आदर
करते हैं।
वास्तव
में कुछ बातें ऐसी होती हैं,
जिसे अभिव्यक्त करने के लिए वाणी पर्याप्त
नहीं होती। हृदय की वेदना, संवेदना
वाणी कभी भी अभिव्यक्त नहीं कर सकती। हृदय के भाव को तो हृदय
ही
समझ
सकता है। मेरे हृदय में जो भाव संजय सर के लिए हैं उन्हें न तो
मैं शब्दों में निरुपित कर सकता हूं और न ही वाणी में लयबध्द
सकता हूं। हृदय,
हृदय की बात
समझ
लेता है। मेरा मन,
वचन और कर्म तीनों ही उन्हें समर्पित है
क्योंकि उनके अभाव में मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं दिखता।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा था-
'गुरू
तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसे उसके योग्य शिष्य नहीं मिल
जाता। उसी तरह एक शिष्य भी तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसे
उसके योग्य गुरू नहीं मिलता। दोनों की संपूर्णता एक दूसरे पर
आश्रित होती है।’
मैं
यह तो नहीं जानता कि मैं वह शिष्य हूं या नहीं जो सर को
संपूर्णता प्रदान कर सकता है। लेकिन स्वयं को उस बिंदु पर लाने
का प्रयास कर रहा हूं जहां
मुझे
संपूर्णता प्राप्त हो सके। संस्कारों की परिभाषा मैंने उनके
साथ रहकर सीखी है। माता-पिता ने जीवन अवश्य दिया,
पर जीना मैंने सर से ही सीखा है। उन्होंने
जाने-अनजाने
मुझे
जो दर्शन दिए हैं,
मैंने उन्हें आत्मसात करने का पूरा प्रयास
किया है। और शायद यही कारण है कि अब मेरा अंतरमन शुध्द होता जा
रहा है। इसमें कुछ विकार हैं जिन्हें मैं पूरे विश्वास के साथ
दूर कर लूंगा। इन बातों का वृत्ति (पेशा) की सफलता से कोई
संबंध हो या न हो पर जीवन की सफलता से संबंध जरूर है। मेरी ऐसी
आशा नहीं कि मैं पेशे में बहुत अधिक सफल हो जाऊं,
लेकिन यह आशा जरूर है कि मैं अपने उन जीवन
मूल्यों में जरूर सफल रहूं जिसे मैंने सर से लिया है। यह उनका
ऋण
है
मुझ
पर। इस
ऋण-भार
से मुक्त होना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है।
अगर
सर को
मुझे
चंद शब्दों में आकार देने को कहा जाए,
तो मैं यही कहूंगा-
'सागर,
जो विचलित नहीं होता
पथ से,
डगर से
जिसमें है गहराई
जो समेटे हुए हैं अपने में
कई नदियां
जिसमें आकाश को बताया
उसका रंग
जिसका किनारा है
दृष्टि
ओझल
जहां पर शुरू हुआ
जीवन
और जहां कभी नहीं होता
विराम
ऐसे ही हैं सर आप
सागर। |