 |
आत्मकथ्य - मुसाफिर हूँ
यारो.....
काले अक्षरों से कागज रंगते,
टेबल पर
झुके
हुए कब चौदह कैलेंडर बीते पता ही नहीं चला...इस बीच कलम थामकर
कागज पर खेलने वाली उंगलियां की-बोर्ड पर थिरकने लगीं। प्रदेश
और शहर बदलते गए,
अखबार भी बदलते गए,
अगर कुछ नहीं बदला तो वह थी इस कलम के साथ जुड़ी एक जिम्मेदारी।
जिसकी धुन में जिंदगी की सबसे अहम चीज फुरसत छिन गई और खबरों
के बीच ही बाकी की जिंदगी सोते,
जागते,
उठते,
बैठते,
खाते,
पीते गुजरती है...एक शायर के इस शेर की तरह-
'अब
तो ये हालत है कि जिंदगी के रात-दिन,
सुबह मिलते हैं मुझे
अखबार में लिपटे हुए
बस्ती : ये जो मेरी बस्ती है...
उत्तर प्रदेश के एक बहुत पिछड़े जिले बस्ती का जिक्र अक्सर बाढ़
या सूखे के समय खबरों में आता है। लगभग उद्योग शून्य और मुंबई,
दिल्ली या कोलकाता में मजदूरी कर जीवनयापन कर रहे लोगों के
द्वारा भेजे जाने वाले
'मनीआर्डर
इकानामी पर यह पूरा का पूरा इलाका जिंदा है। बस्ती शहर से लगकर
बहती हुई कुआनो नदी वैसे तो देखने में बहुत ही निर्मल और
सहिष्णु लगती है,
पर बाढ़ के दिनों में इसकी विकरालता न जाने कितने गांव,
खेत और मवेशियों को अपनी लपेट में लेती है,
कहा नहीं जा सकता। बस्ती जहां खत्म होता है,
वहीं से अयोध्या शुरू होता है। अयोध्या और बस्ती के बीच बहने
वाली सरयू नदी लगभग वही करिश्मा करती है,
जो कुआनो। इसके लंबे पाट पर कितने खेत,
कितने गांव और कितने मवेशी हर साल बह जाते हैं जिन्हें देखते
हुए आंखें पथरा सी गई हैं। हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और
साहित्यकार स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का कविता संग्रह
'कुआनो
नदी इन्हीं विद्रूपताओं के आसपास घूमता है। सर्वेश्वर इस इलाके
की गरीबी,
बदहाली और दैनंदिन जीवन के संघर्ष से जूझती हुई जनता के
आत्मविश्वास को रेखांकित करना नहीं भूलते। वे एक कविता में
लिखते हैं-
गांव के मेले में
पनवाड़ी की दुकान का शीशा
जिस पर
इतनी धूल जम गई है
कि अब कोई अक्स दिखाई नहीं देता।
सर्वेश्वर की यह कविता इस पहचानविहीन इलाके को बहुत अच्छी तरह
से अभिव्यक्त करती है। यह वही शहर है,
जहां मैं पैदा तो नहीं हुआ पर मेरा बचपन इसी शहर में बीता। इस
शहर ने मुझे चीजों को देखने का नजरिया,
लोगों को समझने की दृष्टि और वह पहचान दी,
जिसे लेकर मैं कहीं भी जा सकता था और अपनी अलग
'बस्ती
बसा सकता था। बस्ती मेरी आंखों के सामने जैसा भी रहा हो,
लेकिन आजादी के बहुत पहले जब भारतेंदु हरिश्चंद्र एक बार बस्ती
आए तो उन्होंने बस्ती को देखकर कहा-
'बस्ती
को बस्ती कहौं,
तो काको कहौं उजाड़।
आज का बस्ती जाहिर है उस तरह का नहीं है। एक लंबी सी सड़क और
उसके आसपास ढेर सारी सड़कें उग आई हैं। कई बड़े भवन भी दिखते
हैं। कुछ चमकीले शोरूम भी। बस्ती बदलती दुनिया के साथ बदलने की
सचेतन कोशिश कर रहा है। बस्ती एक ऐसी जगह है,
जो प्रथमदृष्टया किसी भी तरह से आकर्षण का केंद्र नहीं है।
कुआनो नदी भी बरसात के मौसम को छोड़कर बहुत दयनीय दिखती है,
लेकिन साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में यहां के
साहित्यकारों,
पत्रकारों ने जो जगह बनाई है उससे बस्ती मुग्ध होते रहती है।
हिंदी के समालोचना सम्राट आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्मभूमि
अगौना इसी जिले में है। यह एक ऐसा साहित्यिक तीर्थ है,
जिस पर बार-बार सिर झुकाने का मन होता है।
बस्ती शहर से बहुत थोड़ी दूर पर ही मगहर नाम की वह जगह है,
जहां संत कबीर ने अपनी देह त्यागी थी। मगहर को कबीर ने क्यों
चुना?
यह वजह लगभग सब जानते हैं कि काशी में मरने से मोक्ष मिलता है।
कबीर ने इस अंधश्रध्दा को तोड़ने के लिए मगहर का चयन किया था।
कबीर का कहना था कि-
'यदि
मैं काशी में मरता हूं और मुझे मोक्ष मिल जाता है,
तो इसमें राम को क्या श्रेय। इसीलिए कबीर अपनी मृत्यु के लिए
मगहर को चुनते हैं। हमें पता है कबीर की मृत्यु के बाद मगहर
में उनके पार्थिव शरीर को लेकर एक अलग तरह का संघर्ष छिड़ गया।
मुसलमान उन्हें दफनाना चाहते थे,
तो हिंदू उनका हिंदू रीति से अंतिम क्रियाकर्म करना चाहते थे।
इस संघर्ष में जब लोग कबीर के शव के पास जाते हैं,
तो वहां उनका शव नहीं होता,
कुछ फूल पड़े होते हैं। हिंदू-मुसलमान इन फूलों को बांट लेते
हैं और अपने-अपने धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार इन फूलों का ही
अंतिम संस्कार कर देते हैं। वहीं पर मंदिर और मस्जिद अगल-बगल
एक साथ बनाए जाते हैं। एकता का यह स्मारक आज भी हमें प्रेरणा
देता है। यह एक संयोग ही है कि छत्तीसगढ़ के लोक गायक भारती
बंधु मगहर में प्रतिवर्ष होने वाले मगहर महोत्सव में कबीर का
गान करके लौटे हैं। बस्ती शहर में भी उन्हें सुना गया। कबीर इस
तरह से आज भी विविध संस्कृतियों और प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक
आदान-प्रदान का केंद्र बने हुए हैं।
फिर बाद के दौर में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,
डा. लक्ष्मीनारायण लाल,
लक्ष्मीकांत वर्मा,
डा. वागीश शुक्ल,
डा. माहेश्वर तिवारी,
श्याम तिवारी,
अष्टभुजा शुक्ल जैसे कई ऐसे नाम हैं,
जिन्होंने बस्ती को एक अलग पहचान दी है। यह अलग बात है कि
रोजी-रोटी की तलाश में इनमें से ज्यादातर तो बड़े
शहरों
में ही अपना आशियाना बनाने के लिए चले गए और वहां उन्हें जो
पहचान मिली उसने बस्ती को गौरव तो दिया,
किंतु बस्ती का बस्ती ही रहा। सिर्फ और सिर्फ अष्टभुजा शुक्ल
आज की पीढ़ी में एक ऐसे कवि हैं,
जो आज भी सुदूर दीक्षापार नामक गांव में रहकर साहित्य साधना
में लगे हैं।
इसी शहर में बारहवीं तक की पढ़ाई के बाद मुझे
भी उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ जाना पड़ा। यह एक संयोग ही है कि इस
इलाके के ज्यादातर लोग उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद को
सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। बचे-खुचे बनारस चले जाते हैं,
पर जाने क्या हुआ कि मेरा प्रवेश लखनऊ विश्वविद्यालय में
करवाया गया। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि मेरे पिता लखनऊ
विश्वविद्यालय के ही छात्र थे। इस नाते उस विश्वविद्यालय से
उनका राग थोड़ा गहरा रहा होगा। लखनऊ में गुजरे तीन साल छात्र
आंदोलनों में मेरी अति सक्रियता के चलते लगभग उल्लेखनीय नहीं
हैं। कालेज की पढ़ाई से लगभग रिश्ता विद्यार्थी का कम और
परीक्षार्थी का ही ज्यादा रहा। जैसे-तैसे बीए की डिग्री तो मिल
गई,
लेकिन कैरियर को लेकर चिंताएं शुरू हो गईं। इस बीच कुछ समय के
लिए बनारस भी रहना हुआ,
और यहां मन में कहीं यह इच्छा भी रही कि काशी हिंदू
विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की जाए।
बनारस : आत्मा में उतरे राग-रंग
काशी में रहते हुए ऐसा बनारसी रंग चढ़ा,
जो सिर चढ़कर बोलता था। छात्र आंदोलनों से जुड़ा होने के नाते कई
छात्र नेता और नेता अपने मित्रों की सूची में थे। यहां उस समय
बीएचयू के अध्यक्ष रहे देवानंद सिंह और महामंत्री सिध्दार्थ
शेखर सिंह से लेकर प्रदीप दुबे,
जेपीएस राठौर,
राजकुमार चौबे,
दीपक अग्रवाल और मनीष खेमका जैसे न जाने कितने दोस्त बन गए।
इनमें मैं अपने उस समय संरक्षक रहे डा. सुरेश अवस्थी को नहीं
भूल सकता। वे बीएचयू में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक थे। हम
उनके सामने बहुत बच्चे
थे,
लेकिन उन्होंने हमें जिस तरह अपना प्यार और संरक्षण दिया,
उसे भुलाना मुश्किल है। वे प्राय: अपने चौक स्थित घर पर हमें
बुलाते,
सिर्फ बुलाते ही नहीं इतना खिलाते कि उनकी बातों का रस और बढ़
जाता। उनकी धर्मपत्नी इतनी सहज और स्नेहिल थीं कि सुरेशजी का
घर हमें अपना सा लगने लगा। अब सुरेश जी इस दुनिया में नहीं हैं,
लेकिन उनकी बातें,
बनारस को लेकर उनका राग आज भी याद आता है। वे सही मायने में
बनारस को जीने वाले व्यक्ति थे। बनारस उनकी आत्मा में उतर गया
था। लगातार सिगरेट पीते हुए,
बनारस और बनारस वालों की बातें बताते डा. अवस्थी एक ऐसे
कथावाचक में तब्दील हो जाते,
जिसको सुनना और उन बातों से सम्मोहित हो जाना बहुत आसान था।
इसी दौरान मेरे साथ अजीत कुमार और राजकुमार से जो रिश्ते बने,
वो आज तक जिंदा हैं।
बनारस की अपनी एक मस्ती है। शहर के किनारे बहती हुई गंगा नदी
आमंत्रण सी देती है और उसके आसपास बहने वाली हवाएं एक अजीब सा
संतोष भी देती हैं। जीवन और मृत्यु दोनों को बहुत करीब से
देखने वाला यह शहर वास्तव में भोलेबाबा की नगरी क्यों कहा जाता
है यह अहसास यहां रहकर ही हो सकता है। बनारस आप में धीरे-धीरे
उतरता है,
ठीक भांग की गोली की तरह। बनारस के अस्सी इलाके में चाय की
दुकानों पर अनंत बहसों का आकाश है,
जहां अमेरिका के चुनाव से लेकर वीपी सिंह के आरक्षण तक पर
चिंताएं पसरी रहती थीं। बहसों का स्तर भी इतना उच्च कि ऐसा
लगता है कि यह चर्चाएं अभी मारपीट में न बदल जाएं। बनारस आपको
अपने प्रति लापरवाह भी बनाता है। यह बहुत बदलने के बाद भी आज
भी अपनी एक खास बोली और खनक के साथ जीता हुआ शहर है।
इस शहर ने मुझे ढेर सारे दोस्त तो दिए ही,
चीजों को एक अलग और विलक्षण दृष्टि से विश्लेषित करने का साहस
भी दिया। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है,
जहां वर्षभर प्रवेश और वर्षभर परीक्षाएं होती हैं। जिसका श्रेय
वहां की छात्र राजनीति को ही ज्यादा है। बड़ी मुश्किल से अभी
कुछ विश्वविद्यालयों के सत्र नियमित हुए हैं,
वरना हालात तो यह थे कि कुछ विश्वविद्यालयों में सत्र चार वर्ष
तक पीछे चल रहे थे। ऐसे हालात में मैंने बीएचयू के साथ ही
भोपाल में खुले माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के
लिए भी आवेदन कर दिया। बीएचयू से पहले माखनलाल का प्रवेश
परीक्षा का परिणाम आ गया और इस तरह मैं भोपाल चला आया। जब
बीएचयू के प्रवेश परीक्षा के परिणाम आए तब तक माखनलाल का सत्र
तीन माह आगे निकल चुका था। यहां पड़े रहना एक विवशता भी थी और
जरूरत भी।
भोपाल : कलम लियो जहां हाथ
जब मैं पहली बार भोपाल स्टेशन उतरा,
तो मुझे लेने के लिए मेरे सीनियर रहे और पत्रकार ऋतेंद्र माथुर
आए थे। उनकी कृपा से मुझे भोपाल में किसी तरह का कोई कष्ट नहीं
हुआ। वे माखनलाल के छात्र रहे,
इन दिनों इंडिया टुडे में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल
यादव के सहपाठी थे। श्यामलाल यादव ने ही मेरी मदद के लिए
ऋतेंद्र को कहा था। ऋतेंद्र से आरंभिक दिनों में जो मदद और
प्यार मिला,
उसने मुझे यह लगने ही नहीं दिया कि मैं किसी दूसरे प्रदेश में
हूं। इसके बाद ऋतेंद्र ने ही मेरी मुलाकात मेरे अध्यापक डा.
श्रीकांत सिंह से करवाई। डा. श्रीकांत सिंह से मिलने के बाद तो
मेरी दुनिया ही बदल गई। वे बेहद अनुशासनप्रिय होने के साथ-साथ
इतने आत्मीय हैं कि आपकी जिंदगी में उनकी जगह खुद-ब-खुद बनती
चली जाती है। डा. श्रीकांत सिंह और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती
गीता सिंह ने मुझे जिस तरह से अपना स्नेह दिया,
उससे मैं यह भी कह सकता हूं कि मैं घर को भूल गया। वे मेरी
जिंदगी में एक ऐसे शख्स हैं,
जिनकी छाया के बिना मैं कुछ भी नहीं। उनकी डांट-फटकार और उससे
ज्यादा मिले प्यार ने मुझे गढ़ने और एक रास्ता पकड़ने में बहुत
मदद की। मेरे जीवन की अराजकताएं धीरे-धीरे खत्म होने लगीं।
बहुत सामान्य क्षमता का छात्र होने के बावजूद मैंने दैनिक
भास्कर,
भोपाल की नौकरी करते हुए न सिर्फ बीजे की परीक्षा में सर्वाधिक
अंक प्राप्त किए,
बल्कि मुझे विश्वविद्यालय की ओर से मा.गो. वैद्य स्मृति रजत
पदक से सम्मानित भी किया गया। विश्वविद्यालय के तत्कालीन
महानिदेशक वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा,
मेरे विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कमल दीक्षित,
मेरे संपादक महेश श्रीवास्तव,
शिव अनुराग पटेरिया,
स्वदेश के प्रधान संपादक राजेंद्र शर्मा,
स्वदेश के तत्कालीन संपादक हरिमोहन शर्मा,
नई दुनिया में उस समय कार्यरत रहे विवेक मृदुल और साधना सिंह
का जो स्नेह और संरक्षण मुझे मिला उसने मेरे व्यक्तित्व के
विकास में बहुत मदद की। दैनिक नई दुनिया,
भोपाल में मुझे छात्र जीवन में छपने का जितना ज्यादा अवसर मिला,
आज भी मैं उन दिनों को याद कर रोमांचित हो जाता हूं। भास्कर की
नौकरी के दौरान ही एक दिन डा. ओम नागपाल से मुलाकात हुई। उनका
व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि उनके सामने जाते समय भी घबराहट होती
थी। वे न सिर्फ सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी थे,
बल्कि उनके पास सम्मोहित कर देने वाली आवाज थी। वे बोलते समय
जितने प्रभावी दिखते थे,
उनका लेखन भी उतना ही तार्किक और संदर्भित होता था। उनके ज्ञान
का और विश्व राजनीति पर उनकी पकड़ का कोई सानी नहीं था। इस
दौरान उन्होंने मुझसे रसरंग,
पत्रिका के लिए कुछ चीजें लिखवाईं। वे नई पीढ़ी के लिए ऊर्जा के
अजस्र स्रोत थे। आज जबकि वे हमारे बीच नहीं हैं,
उनकी स्मृति मेरे लिए एक बड़ा संबल है।
बीजे की हमारी क्लास में कुल बीस लोग थे। बीस सीटें भी थीं,
जिसमें उत्तर प्रदेश,
बिहार,
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से आए हुए लोग थे। इनमें सुरेश
केशरवानी,
पुरुषोत्तम कुमार,
शरद पंडया,
अजीत कुमार,
धनंजय प्रताप सिंह जैसे तमाम दोस्त मिले,
जिनसे आज भी रिश्ता कायम है। बीजे की परीक्षा पास करने के बाद
स्वदेश,
भोपाल के तत्कालीन संपादक हरिमोहन शर्मा मुझे अपने साथ
'स्वदेश
लेते गए। स्वदेश एक छोटा अखबार था और कर्मचारियों का अभाव यहां
प्राय: बना रहता था। स्वदेश के मालिक और प्रधान संपादक
राजेंद्र शर्मा एक अच्छे पत्रकार के रूप में ख्यातनाम हैं।
उन्होंने और हरिमोहन जी ने मुझे यहां काम करने के स्वतंत्र और
असीमित अवसर उपलब्ध कराए। बाद में कुछ दिनों के लिए यहां
प्रमोद भारद्वाज भी आए,
जो इन दिनों अमर उजाला,
चंडीगढ़ के स्थानीय संपादक हैं। प्रमोद जी से भी मेरी खूब बनी।
उन्होंने मुझे रिपोर्टिंग के कई नए फंडे बताए। जिस पर मैं बाद
के दिनों में अमल इसलिए नहीं कर पाया,
क्योंकि नौकरी देने वालों को मेरा रिपोर्टिंग करना पसंद नहीं
आया,
बल्कि उन्होंने मुझमें एक संपादक की योग्यताएं ज्यादा देखीं।
एमजे की परीक्षा पास करने के बाद राजेंद्र शर्मा का कृपापात्र
होने के नाते
1996
में मुझे स्वदेश,
रायपुर का कार्यकारी संपादक बनाकर छत्तीसगढ़ भेज दिया गया। मेरे
मित्र और शुभचिंतक मेरे इस फैसले के बहुत खिलाफ थे। कई तो मेरे
रायपुर जाने को मेरे कैरियर का अंत भी घोषित कर चुके थे।
रायपुर : एक अलग स्वाद का शहर
रायपुर आना मेरे लिए आत्मिक और मानसिक रूप से बहुत राहत देने
वाला साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की फिजाओं में मैंने खुद को बहुत सहज
पाया। जितना प्यार और आत्मीयता मुझे रायपुर में मिली,
उसने मुझे बांध सा लिया।
1996
का रायपुर शायद दिल्ली से न दिखता रहा हो,
लेकिन उसकी मिठास और उसका अपनापन याद आता है। आज का रायपुर जब
2008
की देहरी पर खड़े होकर देखता हूं,
तो बहुत बदल गया है। शायद इस शहर का राजधानी बन जाना और
राजपुत्रों का हमारे करीब आ जाना इस शहर की तासीर को धीरे-धीरे
बदल रहा है।
1996
का रायपुर एक बड़े गांव का अहसास कराता था,
जहां लगभग सारे परिचित से चेहरे दिखते थे। बहुत सारे
पारा-मोहल्ले में बसा हुआ रायपुर एक अलग ही स्वाद का शहर दिखता
था। लखनऊ,
भोपाल के तेज जीवन ने थोड़ा थकाया-पकाया जरूर रहा होगा,
मुझे लगा मैं अपनी
'बस्ती
में आ गया हूं।
धीरे-धीरे सरकता हुआ शहर,
आज के मुख्यमंत्री आवास तक सिमटा हुआ शहर,
आज जिस तरह अपने आकार से,
भीड़ से,
गाड़ियों के प्रेशर हार्न से आतंकित करता है तो मुझे वह पुराना
रायपुर बार-बार याद आता है। आज जिस बंगले में प्रदेश के
मुख्यमंत्री रहते हैं,
इसी बंगले में कभी कलेक्टर डीपी तिवारी रहा करते थे। उस समय
यहां कमिश्नर रहे जेएल बोस हों या उस समय के एसपी संजय राणा,
सभी याद आते हैं। अधिकारी भी तब आज के अधिकारियों जैसे नहीं
थे। रायपुर सबको अपने जैसा बना लेता था। रायपुर का
गुरुत्वाकर्षण अब मुझे कमजोर होता दिख रहा है। अब लोग रायपुर
को अपने जैसा बनाने में लगे हैं। ब्राम्हणपारा में रहने वाले
लोग हों या पुरानी बस्ती के बाशिंदे,
वे इस बदलते शहर को मेरी तरह ही भौंचक निगाहों से देख रहे हैं।
शहर में अचानक उग आए मेगा मॉल्स,
बंद होते सिनेमाघर उनकी जगह लेता आईनाक्स,
सड़क किनारे से गायब होते पेड़,
गायब होती चिड़ियों की चहचहाहट,
तालाब को सिकोड़ते हुए लोग,
ढेर सी लालबत्तियां और उसमें गुम होते इंसान। रायपुर में रहते
हुए रायपुर के समाज जीवन में सक्रिय अनेक साहित्यकारों,
पत्रकारों से उस समय ही ऐसे रिश्ते बने,
जो मुंबई जाकर भी खत्म नहीं हुए। शायद रिश्तों की यह डोर मुझे
फिर से छत्तीसगढ़ खींच लाई।
इन मुंबई
1997
में मुंबई से नवभारत का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। नवभारत,
छत्तीसगढ़ का बहुत प्रतिष्ठित दैनिक है। उन दिनों बबन प्रसाद
मिश्र,
नवभारत,
रायपुर के प्रबंध संपादक थे। उनकी कृपा और आशीर्वाद से मुझे
नवभारत,
नागपुर के संपादक और मालिक विनोद माहेश्वरी ने मुंबई संस्करण
में काम करने का अवसर दिया। जब मैं मुंबई पहुंचा तो यहां भी
मेरे कई दोस्त और सहयोगी पहले से ही मौजूद थे। इन दिनों स्टार
न्यूज,
दिल्ली में कार्यरत रघुवीर रिछारिया उस समय नवभारत,
मुंबई में ही थे। वे स्टेशन पर मुझे लेने आए और संयोग ऐसा बना
कि मुंबई के तीन साल हमने साथ-साथ ही गुजारे। यहां जिंदगी में
गति तो बढ़ी पर उसने बहुत सारी उन चीजों को देखने और समझने का
अवसर दिया,
जिसे हम एक छोटे से शहर में रहते हुए महसूस नहीं कर पाते।
मुंबई देश का सबसे बड़ा शहर ही नहीं है,
वह देश की आर्थिक धड़कनों का भी गवाह है। यहां लहराता हुआ
समुद्र,
अपने अनंत होने की और आपके अनंत हो सकने की संभावना का प्रतीक
है। यह चुनौती देता हुआ दिखता है। समुद्र के किनारे घूमते हुए
बिंदास युवा एक नई तरह की दुनिया से रूबरू कराते हैं। तेज
भागती जिंदगी,
लोकल ट्रेनों के समय के साथ तालमेल बिठाती हुई जिंदगी,
फुटपाथ किनारे ग्राहक का इंतजार करती हुई महिलाएं,
गेटवे पर अपने वैभव के साथ खड़ा होटल ताज और धारावी की लंबी
झुग्गियां मुंबई के ऐसे न जाने कितने चित्र हैं,
जो आंखों में आज भी कौंध जाते हैं। सपनों का शहर कहीं जाने
वाली इस मुंबई में कितनों के सपने पूरे होते हैं यह तो नहीं
पता,
पर न जाने कितनों के सपने रोज दफन हो जाते हैं। यह किस्से हमें
सुनने को मिलते रहते हैं। लोकल ट्रेन पर सवार भीड़ भरे डिब्बों
से गिरकर
रोजाना कितने लोग अपनी जिंदगी की सांस खो बैठते हैं इसका
रिकार्ड शायद हमारे पास न हो,
किंतु शेयर का उठना-गिरना जरूर दलाल स्ट्रीट पर खड़ी एक इमारत
में दर्ज होता रहता है।
आगे पढ़े...
|
 |