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आत्मकथ्य - मुसाफिर हूँ
यारो.....
क्रमश....
यहां देश के वरिष्ठतम पत्रकार और उन दिनों नवभारत टाइम्स के
संपादक विश्वनाथ सचदेव से मुलाकात अब एक ऐसे रिश्ते में बदल गई
है,
जो उन्हें बार-बार छत्तीसगढ़ आने के लिए विवश करती रहती है।
विश्वनाथ जी ने पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव और अपने जीवन की
सहजता से मुझे बहुत कुछ सिखाया। उनके पास बैठकर मुझे यह हमेशा
लगता रहा कि एक बड़ा व्यक्ति किस तरह अपने अनुभवों को अपनी अगली
पीढ़ी को स्थानांतरित करता है। यहां नवभारत के समाचार संपादक के
रूप में कार्यरत भूपेंद्र चतुर्वेदी का स्नेह भी मुझे निरंतर
मिला। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं,
लेकिन उनकी कर्मठता,
काम के प्रति उनका निरंतर उत्साह मुझे प्रेरित करता है। उसी
दौरान नवभारत परिवार से जुड़े सर्वश्री कमल भुवनेश,
अरविंद सिंह,
केसर सिंह बिष्ट,
अजय भट्टाचार्य,
विमल मिश्र,
सुधीर जोशी,
विनीत चतुर्वेदी जैसे न जाने कितने दोस्त बने,
जो आज भी जुड़े हुए हैं। नवभारत में काम करने के अनेक अवसर
मिले। उससे काम में विविधता और आत्मविश्वास की ही वृध्दि हुई।
वैचारिकी नाम का एक साप्ताहिक पृष्ठ हमने लगातार निकाला,
जिसकी खासी चर्चा होती रही। फिर कई फीचर पत्रिकाओं का ए-4
आकार में प्रकाशन पत्रकारिता का एक अलग अनुभव रहा। इसके
साथ-साथ सिटी डेस्क की वर्किंग का अनुभव भी यहां मिला। यह
अनुभव आपस में इतने घुले-मिले हैं कि जिसने एक पूर्ण पत्रकार
बनाने में मदद ही की।
मुंबई में रहने के दौरान ही वेब पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ,
जिसमें अनेक हिंदी वेबसाइट का भी काम प्रारंभ हुआ। वेबदुनिया,
रेडिफ डाटकाम,
इन्फोइंडिया डाटकाम जैसे अनेक वेबसाइट हिंदी में भी कार्य करती
दिखने लगीं। हिंदी जगत के लिए यह एक नया अनुभव था। हमारे अनेक
साथी इस नई बयार के साथ होते दिखे,
किंतु मैं साहस न जुटा पाया। कमल भुवनेश के बहुत जोर देने पर
मैंने इन्फोइंडिया डाटकाम में चार घंटे की पार्टटाइम नौकरी के
लिए हामी भरी। जिसके लिए मुझे कंटेन्ट असिस्टेंट का पद दिया
गया। वेब पत्रकारिता का अनुभव मेरे लिए एक अच्छा अवसर रहा,
जहां मैंने वेब पत्रकारिता को विकास करते हुए देखा। यह दौर
लंबा न चल सका,
क्योंकि इसी दौरान मेरी शादी भी हुई और शादी के एक महीने बाद
दैनिक भास्कर,
बिलासपुर में समाचार संपादक के रूप में नियुक्ति हो गई और मुझे
छत्तीसगढ़ के दूसरे नंबर के शहर बिलासपुर आ जाना पड़ा।
अथ श्री भास्कर कथा
दैनिक भास्कर,
बिलासपुर आने की कथा भी रोचक है। यहां भी स्वदेश के संपादक रहे
हरिमोहन शर्मा ही मेरे पुन: भास्कर में प्रवेश का कारण बने। वे
उन दिनों हिसार भास्कर के संपादक थे। उन्होंने मुझे पानीपत में
जगदीश शर्मा जी से मिलने के लिए कहा। मैं पानीपत पहुंचा और
श्री शर्मा से मिला। श्री शर्मा इन दिनों भास्कर समूह में
उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने सद्व्यवहार
और आत्मीयता से मुझे बहुत प्रभावित किया ही तथा साथ लेकर अगले
दिन दिल्ली में भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल से
मुलाकात करवाई। श्री अग्रवाल हिंदी पत्रकारिता के उन नायकों
में हैं,
जिन्होंने अपनी कर्मठता से अपने समाचार पत्र को एक विशिष्ट
पहचान दिलाई है। उनके प्रति मेरे मन में वैसे भी बहुत आदरणीय
भाव है। मैं उन्हें पत्रकारिता के चंद गिने-चुने मालिकों में
मानता हूं,
जो हिन्दी में इतनी गंभीरता के साथ एक संपूर्ण अखबार निकालने
का प्रयास कर रहे हैं। उनसे मिलना एक अच्छा अनुभव था। उन्होंने
मुझसे जगहों के विकल्प के बारे में पूछा और चंडीगढ़,
सीकर तथा छत्तीसगढ़ जैसे विकल्प सामने रखे। छत्तीसगढ़ से मेरा एक
भावनात्मक रिश्ता पहले ही बन गया था। जाहिर तौर पर मैंने
छत्तीसगढ़ का विकल्प ही सामने रखा। उन्होंने तत्काल ही बिलासपुर
में समाचार संपादक के रूप में मेरी नियुक्ति कर दी। उनके काम
करने का तरीका,
चीजों को समझने की त्वरा देखते ही बनती है। वे वस्तुत: विलक्षण
प्रतिभा के धनी हैं। हिंदी पत्रकारिता में हो रहे परिवर्तनों
को जिस तेजी के साथ उन्होंने स्वीकार किया और अपने अखबार को भी
आज के समय के साथ चलना सिखाया,
उससे वे एक किंवदंती बन गए हैं।
भास्कर,
बिलासपुर के अपने तीन साल के कार्यकाल में उनसे कुल दो बड़ी
बैठकें ही हो पाईं,
जिनमें एक भोपाल में और दूसरी बिलासपुर के श्यामा होटल में।
आमतौर पर समाचार पत्र मालिकों के प्रति पत्रकारों की देखने की
दृष्टि अलग होती है,
किंतु मैंने यह पाया कि श्री अग्रवाल में संपादकीय मुद्दों की
गहरी समझ है और वे अखबार को बहुत गंभीरता से लेने वाले मालिकों
में से एक हैं। उनके साथ बैठकर बहुत कुछ सीखा और समझा जा सकता
है। इस बीच भास्कर में काम करते हुए उनसे फोन और ई-मेल पर
हल्की-फुल्की सलाहें,
कभी प्रेम की भाषा में तो कभी चेतावनी की भाषा में मिलती रहीं
किंतु इस कार्यकाल ने मुझे आज की पत्रकारिता के लायक बनाया।
साथ ही साथ मेरी कई पूर्व मान्यताओं को बेमानी भी साबित किया।
बिलासपुर शहर में रहते हुए मुझे लोगों से जो अपनापा,
प्यार और सद्भाव मिला वह मेरे जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी है।
यह एक ऐसा शहर था,
जिसने मुझे न सिर्फ काम के महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराए वरन
रिश्तों की दृष्टि से भी बहुत संपन्न बना दिया। दिखने में यह
शहर बहुत ठहरा हुआ सा और धीमी चाल चलने वाला शहर है किंतु यहां
बहने वाली अरपा की तरह लोगों में भी अंत:सलिला बहती है।
प्रतिवाद न करने के बावजूद लोग अपनी राय रखते हैं। साथ ही साथ
धार्मिकता की भावना इस शहर में बहुत गहरी है। सही अर्थों में
यह उस तरह का शहर नहीं है,
जिस नाते शहर,
शहर होते हैं। एक बड़े गांव सा सुख देता यह शहर आज भी अपने
स्वभाव से उतना ही निर्मल और प्यारा है। शहर से लगी रतनपुर की
धरती और यहां विराजी मां महामाया का आशीर्वाद सतत् आसपास के
क्षेत्र पर बरसता दिखता है। यहां की राजनीति,
साहित्य और पत्रकारिता सब कुछ एक-दूसरे आपस में इतने जुड़े हुए
हैं कि बहुत द्वंद नजर नहीं आते।
हिंदी के यशस्वी कवि श्रीकांत वर्मा,
प्रख्यात रंगकर्मी सत्यदेव दुबे का यह शहर इसलिए भी खास है कि
इसी जिले के सुदूर पेंड्रा नामक स्थान से सन्
1901
में पं. माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ मित्र निकालकर पत्रकारिता
की एक यशस्वी परंपरा की शुरुआत की। जड़ों में संस्कारों से
लिपटा यह शहर अपने प्रेमपाश में बहुत जल्दी बांध लेता है। इसकी
सादगी ही इसका सौंदर्य बन जाती है। यहां मुझे मित्रों का इतना
बड़ा परिवार मिला कि बिलासपुर मेरे घर जैसा हो गया। यहां भास्कर
के मेरे दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद मेरे वरिष्ठ
अधिकारी के रूप में हिंदी के महत्वपूर्ण कवि गजानन माधव
मुक्तिबोध के सुपुत्र दिवाकर मुक्तिबोध का आगमन हुआ। उन्होंने
कभी भी अपनी वरिष्ठता की गरिष्ठता का अहसास मुझे नहीं होने
दिया और एक छोटे भाई के रूप में हमेशा अपना स्नेह और संरक्षण
मुझे प्रदान किया। मेरी पुस्तक
'मत
पूछ हुआ क्या-क्या की भूमिका भी उन्होंने कृपापूर्वक लिखी। आज
भी वे मेरे प्रति बेहद आत्मीय और वात्सल्य भरा व्यवहार रखते
हैं।
भास्कर में मेरे सहयोगियों प्रवीण शुक्ला,
सुशील पाठक,
सुनील गुप्ता,
विश्वेश ठाकरे,
सूर्यकांत चतुर्वेदी,
राजेश मुजुमदार,
रविंद्र तैलंग,
अशोक व्यास,
संजय चंदेल,
घनश्याम गुप्ता,
हर्ष पांडेय,
प्रतीक वासनिक,
व्योमकेश त्रिवेदी,
देवेश सिंह,
अनिल रतेरिया,
रविशंकर मिश्रा,
योगेश मिश्रा जैसे तमाम मित्र आज भी एक परिवार की तरह जुड़े हुए
हैं। इसके अलावा शहर में पं. श्यामलाल चतुर्वेदी,
हरीश केडिया,
डा. आरएसएल त्रिपाठी,
बेनी प्रसाद गुप्ता,
पं. नंदकिशोर शुक्ल जैसे समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने
व्यापक संपर्क बने,
जिनका नाम गिनाना मुझे संकट में तो डालेगा ही,
इस लेख की पठनीयता को भी प्रभावित कर सकता है। इसी दौरान लगभग
तीन साल गुरू घासीदास विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग के
अध्यक्ष डा. गोपा बागची और उनके अत्यंत सरल और सौम्य पतिदेव
डा. शाहिद अली की कृपा,
प्रेरणा से विश्वविद्यालय में पत्रकारिता शिक्षण का अवसर भी
मिला। इसमें अनेक विद्यार्थी तो इतने प्रिय हो गए,
जैसे वे मेरे परिवार का ही हिस्सा हैं। जिनमें यशवंत गोहिल नई
पीढ़ी के प्रखर पत्रकारों में हैं,
जो मेरे साथ भास्कर और बाद में हरिभूमि में भी जुड़े रहे। इसी
तरह अनुराधा आर्य,
मधुमिता राव,
नीलम शुक्ला,
दीपिका राव,
सुरेश पांडेय,
शरद पांडेय,
योगेश्वर शर्मा जैसे तमाम विद्यार्थी आज भी उसी भावना से मिलते
हैं। बिलासपुर के तीन साल मेरे जीवन के बीते सालों पर भारी थे।
रायपुर : यादों की महक
यादों की यही महक लिए हुए मैं थोड़े समय के बाद छत्तीसगढ़ की
राजधानी रायपुर से प्रकाशित होने वाले हरिभूमि से जुड़ गया। यह
एक संयोग ही था कि मैं हरिभूमि के तब पंडरी स्थित कार्यालय में
रमेश नैयर से मिलने के लिए आया हुआ था। वे छत्तीसगढ़ के अत्यंत
सम्मानित पत्रकार और मुझे बहुत स्नेह करने वाले व्यक्ति हैं।
स्वदेश,
रायपुर में कार्य करते समय मेरा उनसे संपर्क आया था,
जो उनकी आत्मीयता के नाते निरंतर सघन होता गया। श्री नैयर से
इस मुलाकात के समय ही हिमांशु द्विवेदी से मेरी भेंट हुई। कैसे,
क्या हुआ,
लेकिन मैं मार्च,
2004
में हरिभूमि से जुड़ गया। इसके पूर्व हरिभूमि के संपादक के रूप
में गिरीश मिश्र और एल.एन. शीतल कार्य कर चुके थे। अखबार को
निकलते कुल डेढ़ साल हो गए थे और मैं तीसरा संपादक था। बावजूद
इसके,
अखबार बहुत अच्छे स्वरूप में निकल रहा था। हरिभूमि और हरिभूमि
के पदाधिकारियों से जैसा रिश्ता बना कि वह बहुत आत्मीय होता
चला गया। यहां पर आरंभिक दिनों में छत्तीसगढ़ के अत्यंत श्रेष्ठ
पत्रकार स्वर्गीय रम्मू श्रीवास्तव के साथ काम करने का भी मौका
मिला। कुछ ही समय बाद हिमांशु जी पूर्णकालिक तौर पर रोहतक से
रायपुर आ गए। उनके साथ मेरा जिस तरह का और जैसा आत्मीय संबंध
है,
उसमें उनकी तारीफ को ब्याज निंदा ही कहा जाएगा। बावजूद इसके वे
बेहद सहृदय,
संवेदनशील और किसी भी असंभव कार्य को संभव कर दिखाने की क्षमता
के प्रतीक हैं। उनमें ऊर्जा का एक अजस्र स्रोत है,
जो उन्हें और उनके आसपास के वातावरण को हमेशा जीवंत तथा चैतन्य
रखता है। एक संपादक और एक प्रबंधक के रूप में उनकी क्षमताएं
अप्रतिम हैं। इसके साथ ही उनके पास एक बहुत बड़ा दिल है,
जो अपने दोस्तों और परिजनों के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए
आमादा दिखता है।
इस बीच मेरा चयन कुशाभाऊ पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय,
रायपुर में रीडर के पद पर हो गया। सो मुझे लगभग छ: माह हरिभूमि
से अलग होकर विश्वविद्यालय को अपनी सेवाएं देनी पड़ीं।
विश्वविद्यालय में मेरे पुराने साथी डा. शाहिद अली और नृपेंद्र
शर्मा मौजूद थे। छ: माह का यह समय एक पूर्णकालिक अध्यापक के
रूप में ही गुजरा किंतु मित्रों के लगातार दबाव और तरह-तरह की
प्रतिक्रियाओं से मन जल्दी ही बोर होने लगा। हिमांशुजी का
स्नेहभरा दबाव हमेशा बना रहता था। उनके आदेश पर मुझे अंतत:
विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़कर फिर हरिभूमि में स्थानीय संपादक
के पद पर आना पड़ा। इस दौरान हरिभूमि में काफी परिवर्तन हो चुके
थे। कई पुराने साथी अखबार छोड़कर जा चुके थे और एक नई टीम बनाने
की चुनौती सामने थी। इस दौर में भी नए-नए साथी जुड़े और कई तो
ऐसे जिन्होंने हरिभूमि से ही अपने पत्रकारीय कैरियर की शुरुआत
की। इस बीच धमतरी रोड पर हरिभूमि का नया भवन भी बना। वह बहुत
सुदर्शन अखबार के रूप में ज्यादा रंगीन पन्नों के साथ निकलने
लगा। शहर के बौध्दिक तबकों में भी उसकी खास पहचान बननी शुरू हो
गई। इसका फायदा निश्चित रूप से हम सबको मिला। नगर के
बुध्दिजीवी हरिभूमि के साथ अपना जुड़ाव महसूस करने लगे। वरिष्ठ
पत्रकार बसंत कुमार तिवारी,
बबन प्रसाद मिश्र,
गिरीश पंकज,
जयप्रकाश मानस,
सुधीर शर्मा,
डा. राजेंद्र सोनी,
डा. मन्नूलाल यदु ऐसे न जाने कितने नाम हैं,
जिनका योगदान और सहयोग निरंतर हरिभूमि को मिलता रहा। यह एक ऐसा
परिवार बन रहा था,
जो शब्दों के साथ जीना चाहता है। इस दौरान हरिभूमि ने अपार लोक
स्वीकृति तो प्राप्त की ही,
तकनीकी तौर पर भी खुद को सक्षम बनाया। इसका श्रेय निश्चित रूप
से हरिभूमि के उच्च प्रबंधन को ही जाता है। अब जबकि प्रिंट
मीडिया में
1994
में शुरू हुए अपने कैरियर की एक लंबी पारी खेलकर मैं
इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा हूं तो यह
मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ ही कहा जाएगा। यह असुरक्षा में
एक छलांग भी है और स्वयं को तौलने का एक अवसर भी। यह समय मुझे
कैसे और कितना बदल पाएगा,
इसे हम और आप मिलकर देखेंगे। तब तक इलेक्ट्रानिक मीडिया की
भाषा में मैं एक ब्रेक ले लेता हूं।
(शुक्रवार,
20
जून,
2008)
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